श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 23: महाराज पृथु का भगवद्धाम गमन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  4.23.28 
स वञ्चितो बतात्मध्रुक् कृच्छ्रेण महता भुवि ।
लब्ध्वापवर्ग्यं मानुष्यं विषयेषु विषज्जते ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य इस संसार में बहुत अधिक संघर्षपूर्ण कार्यों में लगा रहता है और जो मनुष्य के शरीर को पाकर, जिसे दुखों से मुक्ति पाने का मौका माना जाता है, कठिन कामों को करना जारी रखता है, तो उसे धोखाधड़ी माना जाना चाहिए और अपने ही प्रति ईर्ष्यालु माना जाना चाहिए।
 
A man who is engaged in accomplishing tasks that require great struggle in this world, and who, having obtained a human body—which is an opportunity to attain liberation from suffering—performs difficult, fruitive tasks, should consider himself to have been deceived and be jealous of himself.
तात्पर्य
इस भौतिक संसार में लोग केवल कामुक संतुष्टि में थोड़ी सी सफलता प्राप्त करने के लिए ही प्रयास करते रहते हैं। कर्मी बड़े कठिन क्रियाकलापों में लिप्त रहते हैं, और इस प्रकार वे विशालकाय फ़ैक्ट्रियाँ खोलते हैं, बड़े शहर बसाते हैं, बड़े वैज्ञानिक अन्वेषण करते हैं, आदि। दूसरे शब्दों में, वे उच्चतर ग्रह प्रणालियों में ऊपर उठने के लिए बड़े महँगे बलिदानों में लिप्त रहते हैं। इसी प्रकार, योगी साधना के कठोर अभ्यासों को अंगीकार करके एक समान लक्ष्य हासिल करने में जुटे रहते हैं। ज्ञानी, भौतिक प्रकृति के चंगुल से मुक्त होने के लिए दार्शनिक अटकलों में लिप्त रहते हैं। इस प्रकार सभी व्यक्ति कामुक संतुष्टि के लिए ही बड़े कठिन कामों में निरंतर लिप्त रहते हैं। ये सभी कामुक संतुष्टि की गतिविधियों (या विषय) में लिप्त माने जाते हैं क्योंकि ये सभी भौतिक अस्तित्व के लिए कुछ सुविधा की मांग करते हैं। वास्तव में इस तरह की गतिविधियों के परिणाम अस्थायी होते हैं। जैसा कि भगवान कृष्ण स्वयं भगवद् गीता (7.23) में कहते हैं, अंतवत तु फलं तेसाम: "देवताओं की पूजा करने वालों के पुरस्कार सीमित और अस्थायी होते हैं।" इस प्रकार, योगी, कर्मी और ज्ञानी की गतिविधियों के फल अल्पकालिक होते हैं। इसके अलावा, कृष्ण कहते हैं, तद् भवत्य् अल्पमेधसाम: "वे केवल तुच्छ बुद्धि के लोगों के लिए होते हैं।" विषय शब्द इंद्रिय संतुष्टि को दर्शाता है। कर्मी दो टूक कहते हैं कि वे इंद्रिय संतुष्टि चाहते हैं। योगी भी इंद्रिय संतुष्टि चाहते हैं, लेकिन वे इसे उच्च स्तर पर चाहते हैं। योग के अभ्यास के माध्यम से कुछ चमत्कारी परिणाम दिखाना उनकी इच्छा होती है। इसलिए वे सबसे छोटे से भी छोटा या सबसे बड़े से भी बड़ा बनने में, या पृथ्वी जैसे ग्रह बनाने में, या वैज्ञानिकों के रूप में, अनेक अद्भुत मशीनों का आविष्कार करने में सफलता प्राप्त करने के लिए बहुत परिश्रम करते हैं। इसी प्रकार, ज्ञानी भी इंद्रिय संतुष्टि में ही लिप्त रहते हैं, क्योंकि वे केवल परमेश्वर के साथ एक होने में रुचि रखते हैं। इस प्रकार, इन सभी गतिविधियों का उद्देश्य अधिक या कम मात्रा में इंद्रिय संतुष्टि ही है। हालाँकि, भक्त कामुक संतुष्टि की प्रथाओं में रुचि नहीं रखते हैं; वे भगवान की सेवा करने का अवसर पाकर ही संतुष्ट हो जाते हैं। यद्यपि वे किसी भी स्थिति में संतुष्ट हैं, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है जो वे प्राप्त न कर सकें, क्योंकि वे पूरी तरह से भगवान की सेवा में लगे रहते हैं। देवताओं की पत्नियाँ कामुक संतुष्टि गतिविधियों के करने वालों को वंचित, ठगा हुआ मानती हैं। इस प्रकार लिप्त व्यक्ति वास्तव में खुद को नष्ट कर रहे हैं (आत्म-हा)। जैसा कि श्रीमद्-भागवतम (11.20.17) में कहा गया है:

नृ-देहम् आदिम् सुलभम् सुदुर्लभम्

प्लवम् सुकल्पम् गुरु-करुणधराम

मयानुकूलन नभस्वतरीतम

पुमान् भवाब्धिम् न तरेत् सा आत्म-हा

जब कोई बड़े सागर को पार करना चाहता है, तो उसे एक मज़बूत नाव की आवश्यकता होती है। ऐसा कहा जाता है कि जीवन का यह मानवीय रूप एक अच्छी नाव है जिसके द्वारा कोई अज्ञानता के सागर को पार कर सकता है। जीवन के मानवीय रूप में कोई आध्यात्मिक गुरु, एक अच्छे नाविक का मार्गदर्शन प्राप्त कर सकता है। कृष्ण की कृपा से अनुकूल हवा भी मिलती है, और वह हवा कृष्ण के निर्देश हैं। मानव शरीर नाव है, भगवान कृष्ण के निर्देश अनुकूल हवाएँ हैं, और आध्यात्मिक गुरु नाविक है। आध्यात्मिक गुरु अच्छी तरह से जानता है कि हवाओं को अनुकूल रूप से पकड़ने और नाव को अपने गंतव्य तक ले जाने के लिए पालों को कैसे समायोजित किया जाए। हालाँकि, यदि कोई इस अवसर का लाभ नहीं उठाता है, तो वह जीवन के मानवीय रूप को बर्बाद कर देता है। इस तरह से समय और जीवन को बर्बाद करना आत्महत्या करने के समान है।

इस छंद में 'लाभध्वापवर्ग्यम' शब्द महत्वपूर्ण है, क्योंकि जीव गोस्वामी के अनुसार, आपवर्ग्यम, या मुक्ति का मार्ग, अवैयक्तिक ब्रह्म में विलय को नहीं, बल्कि सलोख्यादि-सिद्धि को दर्शाता है, जिसका अर्थ है उस ग्रह को प्राप्त करना जहाँ भगवान का निवास है। पाँच प्रकार की मुक्ति होती है और एक को सायुज्य-मुक्ति या परम के अस्तित्व में विलय, या अवैयक्तिक ब्रह्म तेज में विलय कहा जाता है। हालाँकि, ब्रह्म तेज से भौतिक आकाश में फिर से गिरने की संभावना होती है, श्रील जीव गोस्वामी सलाह देते हैं कि जीवन के इस मानवीय रूप में किसी का एकमात्र उद्देश्य घर वापस, भगवान के पास जाना होना चाहिए। शब्द सा वंचितः बताते हैं कि एक बार जब किसी व्यक्ति को मानव जीवन प्राप्त हो जाता है, तो वह वास्तव में ठगा जाता है यदि वह घर वापस, भगवान के पास जाने की तैयारी नहीं करता है। सभी गैर-भक्तों की स्थिति, जो भगवान के पास वापस जाने में रुचि नहीं रखते हैं, बहुत ही निंदनीय है, क्योंकि मानव जीवन का उद्देश्य भक्ति सेवा करना है और कुछ नहीं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)