नृ-देहम् आदिम् सुलभम् सुदुर्लभम्
प्लवम् सुकल्पम् गुरु-करुणधराम
मयानुकूलन नभस्वतरीतम
पुमान् भवाब्धिम् न तरेत् सा आत्म-हा
जब कोई बड़े सागर को पार करना चाहता है, तो उसे एक मज़बूत नाव की आवश्यकता होती है। ऐसा कहा जाता है कि जीवन का यह मानवीय रूप एक अच्छी नाव है जिसके द्वारा कोई अज्ञानता के सागर को पार कर सकता है। जीवन के मानवीय रूप में कोई आध्यात्मिक गुरु, एक अच्छे नाविक का मार्गदर्शन प्राप्त कर सकता है। कृष्ण की कृपा से अनुकूल हवा भी मिलती है, और वह हवा कृष्ण के निर्देश हैं। मानव शरीर नाव है, भगवान कृष्ण के निर्देश अनुकूल हवाएँ हैं, और आध्यात्मिक गुरु नाविक है। आध्यात्मिक गुरु अच्छी तरह से जानता है कि हवाओं को अनुकूल रूप से पकड़ने और नाव को अपने गंतव्य तक ले जाने के लिए पालों को कैसे समायोजित किया जाए। हालाँकि, यदि कोई इस अवसर का लाभ नहीं उठाता है, तो वह जीवन के मानवीय रूप को बर्बाद कर देता है। इस तरह से समय और जीवन को बर्बाद करना आत्महत्या करने के समान है।
इस छंद में 'लाभध्वापवर्ग्यम' शब्द महत्वपूर्ण है, क्योंकि जीव गोस्वामी के अनुसार, आपवर्ग्यम, या मुक्ति का मार्ग, अवैयक्तिक ब्रह्म में विलय को नहीं, बल्कि सलोख्यादि-सिद्धि को दर्शाता है, जिसका अर्थ है उस ग्रह को प्राप्त करना जहाँ भगवान का निवास है। पाँच प्रकार की मुक्ति होती है और एक को सायुज्य-मुक्ति या परम के अस्तित्व में विलय, या अवैयक्तिक ब्रह्म तेज में विलय कहा जाता है। हालाँकि, ब्रह्म तेज से भौतिक आकाश में फिर से गिरने की संभावना होती है, श्रील जीव गोस्वामी सलाह देते हैं कि जीवन के इस मानवीय रूप में किसी का एकमात्र उद्देश्य घर वापस, भगवान के पास जाना होना चाहिए। शब्द सा वंचितः बताते हैं कि एक बार जब किसी व्यक्ति को मानव जीवन प्राप्त हो जाता है, तो वह वास्तव में ठगा जाता है यदि वह घर वापस, भगवान के पास जाने की तैयारी नहीं करता है। सभी गैर-भक्तों की स्थिति, जो भगवान के पास वापस जाने में रुचि नहीं रखते हैं, बहुत ही निंदनीय है, क्योंकि मानव जीवन का उद्देश्य भक्ति सेवा करना है और कुछ नहीं।
