हालाँकि महारानी अर्चि इस प्रकार के कष्टों की अभ्यस्त नहीं थीं, फिर भी वन में रहने की मर्यादाओं में उन्होंने ऋषियों की तरह अपने पति का साथ निभाया। वे ज़मीन पर सोती थीं और केवल फल, फूल और पत्तियाँ ही खाती थीं। चूँकि वे इन कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं थी, अतः वे क्षीण और दुबली-पतली हो गईं। फिर भी उन्हें अपने पति की सेवा करने से जो सुख मिलता था, उसके कारण उन्हें किसी कष्ट का एहसास नहीं होता था।
Although Queen Archi was not accustomed to endure such hardships, she accompanied her husband in the rituals of living in the forest like the sages. She slept on the ground and ate only fruits, flowers and leaves. Since she was not fit for these activities, she became very weak. Still, she did not feel any pain because of the joy she got from serving her husband.
तात्पर्य
भर्तुर्व्रतधर्मानिष्ठया शब्द यह इंगित करता है की एक स्त्री का कर्तव्य या धार्मिक सिद्धांत अपने पति की सेवा करना है चाहे परिस्थिति कोई भी हो। वैदिक सभ्यता में एक पुरुष को जीवन की शुरुआत से ही ब्रह्मचारी बनना सिखाया जाता है, फिर एक आदर्श गृहस्थ, फिर वानप्रस्थ, फिर संन्यासी और पत्नी को सिखाया जाता है कि वह बस हर परिस्थिति में पति का अनुसरण कड़ाई से करे। ब्रह्मचर्य के बाद एक पुरुष गृहस्थ का जीवन अपनाता है और माता-पिता अपनी बेटी को सिखाते हैं की वह एक पवित्र पत्नी बने। इस प्रकार जब एक लड़की और एक लड़का मिलते हैं तो दोनों को उच्च उद्देश्य वाले जीवन के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। लड़के को जीवन के उच्च उद्देश्य के अनुसार अपने कर्तव्य निभाने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है और लड़की को उसका अनुसरण करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। पतिव्रता स्त्री का कर्तव्य है की वह अपने पति को हर प्रकार से गृहस्थ जीवन में प्रसन्न रखे और जब पति गृहस्थ में से निवृत्त हो जाता है, उसे वन में जाना होता है और वानप्रस्थ या वनवासी का जीवन अपनाना होता है। उस समय पत्नी को अपने पति का अनुसरण करना होता है और उसका ध्यान रखना होता है जैसे उसने गृहस्थ जीवन में उसका ध्यान रखा होता था। परन्तु जब पति जीवन का संन्यास नामक त्यागी आश्रम लेता है तो पत्नी को घर वापस लौटना होता है और एक सन्यासिनी बनना होता है और अपने बच्चों और बहुओं के लिए उदाहरण स्थापित करना होता है और उन्हें दिखाना होता है कैसे संयमित जीवन जिया जाता है। जब चैतन्य महाप्रभु ने संन्यास लिया, उनकी पत्नी विष्णुप्रियादेवी जो उस समय केवल सोलह वर्ष की थी, ने भी अपने पति के घर छोड़ने के कारण संयम का व्रत लिया। वह अपनी माला जपती थी और एक चक्कर पूरा होने पर एक चावल का दाना इकठ्ठा करती थी। इस तरह जितने भी चक्कर वह जपती उतने ही चावल के दाने वह प्राप्त करती और फिर उन्हें पकाकर प्रसाद लेती। इसे संयम कहते हैं। आज भी भारत में विधवाएँ या जिन स्त्रियों के पति ने संन्यास लिया हो वह संयम के सिद्धांतों का पालन करती हैं, भले ही वह अपने बच्चों के साथ रहती हैं। पृथु महाराज की पत्नी, आर्ची निरंतर अपने पत्नी कर्तव्य को निभाने के लिए दृढ़ थीं और जब उनके पति वन में थे, वह उनका अनुसरण करती थीं केवल फल और पत्ते खाती थीं और जमीन पर सोती थीं। चूँकि एक स्त्री का शरीर पुरुष की तुलना में बहुत अधिक कोमल होता है, रानी आर्ची बहुत दुर्बल और पतली हो गयीं, परिकर्षिता। जब कोई तपस्या करता है तो उसका शरीर सामान्यतः दुर्बल और पतला हो जाता है। मोटापा आध्यात्मिक जीवन में बहुत अच्छा गुण नहीं है क्योंकि एक व्यक्ति जो आध्यात्मिक जीवन में लगा हो उसे अपने शरीर के सुख – जैसे की भोजन, निद्रा और संभोग को कम से कम करना चाहिए। यद्यपि रानी आर्ची विनियमित सिद्धांत के अनुसार वन में रहने से दुर्बल हो गयीं, परन्तु वह दुखी नहीं थीं क्योंकि उन्हें अपने महान पति की सेवा करने का सम्मान मिल रहा था।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥