श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 23: महाराज पृथु का भगवद्धाम गमन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  4.23.18 
तं सर्वगुणविन्यासं जीवे मायामये न्यधात् ।
तं चानुशयमात्मस्थमसावनुशयी पुमान् ।
ज्ञानवैराग्यवीर्येण स्वरूपस्थोऽजहात्प्रभु: ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
तब पृथु महाराज ने जीवात्मा की सम्पूर्ण उपाधि माया के परम नियन्ता को अर्पित कर दी। ज्ञान तथा वैराग्य और भक्ति की आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा वे जीवात्मा की उन समस्त उपाधियों से मुक्त हो गये जिनसे वे घिरे हुए थे। इस प्रकार कृष्ण भावना की अपनी मूल सांविधानिक स्थिति में रहकर उन्होंने प्रभु या इन्द्रियों के नियन्ता के रूप में अपना शरीर त्याग दिया।
 
Then Pṛthu Mahārāja surrendered the entire title of the living soul to the Supreme Lord (the controller) of māyā. By knowledge and the spiritual power of detachment and devotion, he was freed from all the titles of the living soul with which he was surrounded. Thus, being in his original natural state (svarūpa-sthiti) of Kṛṣṇa consciousness, he gave up his body as the Lord (the controller of the senses).
तात्पर्य
जैसै कि वेदों में कहा गया है, ईश्वर ही भौतिक ऊर्जा के स्रोत हैं। इस कारण उन्हें कभी-कभी माया-माया भी कहा जाता है, या सर्वोच्च व्यक्ति, जो अपनी शक्ति के माध्यम से अपनी लीलाएँ रच सकते हैं। जवा, या व्यक्तिगत जीवित इकाई, ईश्वर की सर्वोच्च इच्छा से भौतिक ऊर्जा द्वारा प्रताड़ित हो जाती है। भगवद गीता में (18.61) हम समझते हैं:

ईश्वरः सर्व-भूतानां

हृद्-देशेऽर्जुन तिष्ठति

भ्रामयन सर्व-भूतानि

यंत्रारूढ़ानि मायाया

ईश्वर, सर्वोच्च व्यक्ति ईश्वर, सभी निरंतर आत्माओं के ह्रदय में स्थित है, और उनकी सर्वोच्च इच्छा से, जीवित इकाई, या व्यक्तिगत आत्मा, भौतिक प्रकृति पर विभिन्न प्रकार के शरीरों में शासन करने की सुविधा प्राप्त करती है, जिन्हें यंत्र कहा जाता है, या संपूर्ण भौतिक ऊर्जा, माया द्वारा दी जाने वाली चलती गाड़ी। हालाँकि व्यक्तिगत जीवित इकाई (जीव) और भगवान दोनों भौतिक ऊर्जा में स्थित हैं, भगवान भौतिक ऊर्जा के माध्यम से उन्हें विभिन्न प्रकार के शरीर प्रदान करके जीव आत्मा के आंदोलनों को निर्देशित कर रहे हैं, और इस प्रकार जीवित इकाई कई प्रकार के शरीर में विभिन्न स्र्भ्ा में घूम रहा है और विभिन्न स्थितियों में शामिल हो जाता है, फलदायी गतिविधियों की प्रतिक्रियाओं में भाग लेता है।

जब पृथु महाराज अपने आध्यात्मिक ज्ञान (ज्ञान) की वृद्धि और भौतिक इच्छाओं के त्याग से आध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली बन गए, तो वे एक प्रभु, या अपनी इंद्रियों के मालिक (कभी-कभी गोस्वामी या स्वामी कहलाते हैं) बन गए। इसका मतलब है कि अब वे भौतिक ऊर्जा के प्रभाव से नियंत्रित नहीं थे। जब कोई भौतिक ऊर्जा के प्रभाव को छोड़ने के लिए काफी मजबूत होता है, तो उसे प्रभु कहा जाता है। इस श्लोक में स्वरूप-स्थः शब्द भी बहुत महत्वपूर्ण है। व्यक्तिगत आत्मा की वास्तविक पहचान इस ज्ञान को समझने या प्राप्त करने में निहित है कि वह कृष्ण का शाश्वत सेवक है। इस समझ को स्वरूपोपलब्धि कहा जाता है। भक्ति सेवा की संस्कृति करके, भक्त धीरे-धीरे सर्वोच्च व्यक्ति ईश्वर के साथ अपने वास्तविक संबंध को समझने लगता है। किसी की आध्यात्मिक स्थिति की यह समझ स्वरूपोपलब्धि कहलाती है, और जब कोई उस स्थिति को प्राप्त करता है तो वह समझ सकता है कि वह सर्वोच्च व्यक्ति ईश्वर के साथ एक सेवक या मित्र के रूप में, या माता-पिता या संयुग्मक प्रेमी के रूप में कैसे संबंधित है। समझ की इस स्थिति को स्वरूप-स्थः कहा जाता है। पृथु महाराज ने इस स्वरूप को पूरी तरह से महसूस किया, और बाद के छंद में यह स्पष्ट होगा कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से वैकुण्ठ से भेजे गए रथ पर सवार होकर इस दुनिया को या इस शरीर को छोड़ दिया।

इस श्लोक में प्रभु शब्द भी महत्वपूर्ण है। जैसा कि पहले कहा गया है, जब कोई पूरी तरह से आत्म-साक्षात्कार करता है और उस स्थिति के अनुसार कार्य करता है, तो उसे प्रभु कहा जा सकता है। अध्यात्मिक गुरु को प्रभु पद से संबोधित किया जाता है क्योंकि वह पूरी तरह से आत्म-साक्षात्कार वाली आत्मा है। पाद शब्द का अर्थ है "स्थिति", और प्रभु पद यह दर्शाता है कि उसे प्रभु, या सर्वोच्च व्यक्ति ईश्वर की स्थिति दी गई है, क्योंकि वह सर्वोच्च व्यक्ति ईश्वर की ओर से कार्य करता है। जब तक कोई प्रभु या इंद्रियों का नियंत्रण नहीं, वह अध्यात्मिक गुरु के रूप में कार्य नहीं कर सकता, जिन्हें सर्वोच्च प्रभु, या भगवान कृष्ण द्वारा अधिकृत किया जाता है। अध्यात्मिक गुरु की प्रशंसा करते हुए अपने श्लोकों में, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने लिखा है:

साक्षाद-धरित्वेन समस्त-शास्त्रैर

उक्त तथा भाव्यता एव साधुभिः

"आध्यात्मिक गुरु की पूजा उतनी ही की जाती है जितनी कि भगवान की, क्योंकि वह भगवान का सबसे अधिक गोपनीय सेवक है।" इस प्रकार पृथु महाराज को भी प्रभुपादा के नाम से पुकारा जा सकता है, या जैसा यहाँ वर्णित किया गया है, प्रभु के रूप में। इस संबंध में एक और प्रश्न उठाया जा सकता है: चूँकि पृथु महाराज भगवान के पूर्ण व्यक्तित्व के शक्त्यावेश-अवतार थे, तो उन्हें प्रभु बनने के लिए नियमों का पालन क्यों करना पड़ा? क्योंकि वे इस पृथ्वी पर एक आदर्श राजा के रूप में प्रकट हुए थे और क्योंकि राजा का कर्तव्य नागरिकों को भक्ति सेवा के निष्पादन में निर्देश देना है, उन्होंने दूसरों को सिखाने के लिए भक्ति सेवा के सभी नियमों का पालन किया। इसी तरह, चैतन्य महाप्रभु, स्वयं कृष्ण होने के बाद भी, हमें सिखाया कि एक भक्त के रूप में कृष्ण से कैसे संपर्क किया जाए। कहा जाता है, आपनी आचारी' भक्ति शिखाइनू सबारे. भगवान चैतन्य महाप्रभु ने भक्ति सेवा की प्रक्रिया में दूसरों को अपने व्यक्तिगत कार्यों के माध्यम से उदाहरण स्थापित करके निर्देश दिया। इसी तरह, पृथु महाराज, यद्यपि एक शक्त्यावेश-अवतार अवतार थे, फिर भी उन्होंने प्रभु पद को प्राप्त करने के लिए एक भक्त के रूप में बिल्कुल व्यवहार किया। इसके अलावा, स्वरूप-स्थ: का अर्थ है "पूर्ण मुक्ति।" जैसा कि कहा गया है (भागवत 2.10.6): हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः: जब कोई जीवित प्राणी माया के कार्यों को त्याग देता है और वह स्थिति प्राप्त कर लेता है जहाँ से वह भक्ति सेवा कर सकता है, तो उसकी स्थिति स्वरूप-स्थः कहलाती है, या पूर्ण मुक्ति।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)