श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 23: महाराज पृथु का भगवद्धाम गमन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.23.17 
इन्द्रियेषु मनस्तानि तन्मात्रेषु यथोद्भवम् ।
भूतादिनामून्युत्कृष्य महत्यात्मनि सन्दधे ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने स्थितियों के अनुसार मन को इन्द्रियों में लीन कर दिया और इन्द्रियों को इन्द्रियपदार्थों (तन्मात्राओं) में और अहंकार को समष्टि भौतिक शक्ति, महत् तत्त्व, में लीन कर दिया।
 
According to the situations, he absorbed the mind in the senses, the senses in the sense objects (tanmatras) and the ego in the universal physical energy, the mahat element.
तात्पर्य
अहं के संबंध में, सारी भौतिक ऊर्जा दो भागों में विभाजित हो जाती है — एक अज्ञानता के प्रकार के आन्दोलित है और दूसरा जुनून और अच्छाई के प्रकार से आन्दोलित है | अज्ञानता के प्रकार से आन्दोलन के कारण, पांच स्थूल तत्व पैदा होते हैं | जुनून के प्रकार से आन्दोलन के कारण, मन पैदा होता है, और अच्छाई के प्रकार से आन्दोलन के कारण, मिथ्या अहंकार, या मामले के साथ पहचान, पैदा होती है | मन एक विशेष प्रकार के देवता द्वारा संरक्षित है | कभी-कभी मन (मन) को भी एक नियंत्रक देवता या देवता के रूप में समझा जाता है | इस तरह से, पूरे मन, अर्थात् भौतिक देवताओं द्वारा नियंत्रित भौतिक मन, इंद्रियों के साथ जुड़ गया | बदले में, इंद्रियाँ संवेदना वस्तुओं के साथ जुड़ गईं | संवेदना वस्तुएँ रूप, स्वाद, गंध, ध्वनि आदि हैं | ध्वनि संवेदना वस्तुओं का अंतिम स्रोत है | मन इंद्रियों और इंद्रियों द्वारा संवेदना वस्तुओं द्वारा आकर्षित था, और वे सभी अंततः आकाश में जुड़ गए | सृजन इतनी व्यवस्थित है कि कारण और प्रभाव एक के बाद एक आते हैं | मर्जिंग प्रक्रिया में प्रभाव को मूल कारण के साथ मिलाना शामिल है | चूँकि भौतिक दुनिया में अंतिम कारण महा-तत्व है, इसलिए सब कुछ धीरे-धीरे घाव हो गया था और महा-तत्व के साथ मिला दिया गया था | इसकी तुलना शुन्य-वाद, या शून्यवाद से की जा सकती है, लेकिन यह वास्तविक आध्यात्मिक मन, या चेतना को साफ करने की प्रक्रिया है |

जब मन सभी भौतिक संदूषण से पूरी तरह से धुल जाता है, तो शुद्ध चेतना कार्य करती है | आध्यात्मिक आकाश से ध्वनि कंपन स्वचालित रूप से सभी भौतिक संदूषण को साफ कर सकता है, जैसा कि चैतन्य महाप्रभु द्वारा पुष्टि की गई है: सेटो-दरपण-मार्जनम | हमें केवल भगवान चैतन्य महाप्रभु की सलाह लेने और सभी भौतिक संदूषण के मन को साफ करने के लिए हरि कृष्ण मंत्र का जाप करने की आवश्यकता है, और इसे इस कठिन कविता का सारांश माना जा सकता है | जैसे ही इस मंत्र के जप की प्रक्रिया से पूरा भौतिक संदूषण धुल जाता है, भौतिक गतिविधियों की सभी इच्छाएँ और प्रतिक्रियाएँ तुरंत हार जाती हैं, और वास्तविक जीवन, शांतिपूर्ण अस्तित्व शुरू होता है | कलि के इस युग में इस श्लोक में वर्णित योगिक प्रक्रिया को अपनाना बहुत मुश्किल है | जब तक कोई इस तरह के योग में बहुत विशेषज्ञ न हो, तब तक सबसे अच्छा तरीका यह है कि भगवान चैतन्य महाप्रभु, श्री कृष्ण-संकीर्तन के तरीके और साधनों को अपनाया जाए | इस प्रकार कोई हरि कृष्ण, हरि कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरि हर/ हर राम, हर राम, राम राम, हर हर के सरल तरीके से सभी भौतिक संदूषण से मुक्त हो सकता है | जिस तरह इस भौतिक दुनिया में जीवन की शुरुआत भौतिक ध्वनि में होती है, उसी तरह आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत इस आध्यात्मिक ध्वनि कंपन में होती है |

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)