जब कोई जीवित इकाई भौतिक आवरणों को त्याग देती है, तो वह एक आत्मा रह जाती है। यह आत्मा ब्रह्म तेज में विलीन होने के लिए आध्यात्मिक आकाश में प्रवेश करनी चाहिए। दुर्भाग्य से, जब तक जीवित इकाई को आध्यात्मिक दुनिया और वैकुंठों की जानकारी नहीं होती है, तब तक उसके भौतिक अस्तित्व में फिर से गिरने की 99.9 प्रतिशत संभावना रहती है। हालाँकि, ब्रह्म तेज या ब्रह्मज्योति से आध्यात्मिक ग्रह में प्रोन्नत होने की थोड़ी संभावना है। इस ब्रह्मज्योति को अवैयक्तिकवादी विविधता के बिना मानते हैं, और बौद्ध इसे शून्य मानते हैं। किसी भी मामले में, चाहे कोई आध्यात्मिक आकाश को विविधता के बिना या शून्य के रूप में स्वीकार करता हो, आध्यात्मिक ग्रहों, वैकुंठों या कृष्णलोक में आनंद लिया जाने वाला कोई भी आध्यात्मिक आनंद नहीं है। आनंद की किस्मों की अनुपस्थिति में, आत्मा धीरे-धीरे आनंद का जीवन जीने के लिए आकर्षण महसूस करती है, और कृष्णलोक या वैकुंठलोक की कोई जानकारी नहीं होने के कारण, वह भौतिक किस्मों का आनंद लेने के लिए स्वाभाविक रूप से भौतिक गतिविधियों में गिर जाती है।
