इस छंद के वर्णन से ऐसा प्रतीत होता है कि महाराजा पृथु की ऊपरी ग्रह तंत्रों में स्वयं को बढ़ावा देने की कोई इच्छा नहीं थी। वह तुरंत घर लौटना चाहते थे, भगवान के पास वापस। हालाँकि महाराजा पृथु ने कृष्ण चेतना प्राप्त करने के बाद रहस्यवादी योग का सारा अभ्यास बंद कर दिया था, पर उन्होंने अपने पिछले अभ्यास का लाभ उठाया और भगवान के पास जल्दी से लौटने के लिए तुरंत खुद को ब्रह्म-भूत मंच पर रखा। आसन के इस विशेष तंत्र का उद्देश्य, जिसे मुक्ति के लिए बैठने का आसन या मुक्तासन कहा जाता है, कुंडलिनी-चक्र में सफलता प्राप्त करना और जीवन को धीरे-धीरे मूलाधार-चक्र से स्वाधिष्ठान-चक्र, फिर मणिपूर-चक्र, अनाहत-चक्र, विशुद्ध-चक्र और अंत में आज्ञा-चक्र में उठाना है। जब योगी आज्ञा-चक्र तक पहुँच जाता है, जो दो आँखों के बीच होता है, तो वह ब्रह्मरंध्र, या अपनी खोपड़ी के छिद्र में प्रवेश करने में सक्षम हो जाता है, और वैकुंठ के आध्यात्मिक राज्य या कृष्णलोक तक, किसी भी ग्रह पर जा सकता है। निष्कर्ष यह है कि भगवान के पास वापस जाने के लिए व्यक्ति को ब्रह्म-भूत स्तर पर आना होगा। हालाँकि, जो कृष्ण चेतना में हैं या जो भक्ति-योग (श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पाद-सेवनं) का अभ्यास कर रहे हैं, वे मुक्तासन प्रक्रिया का अभ्यास किए बिना भी भगवान के पास लौट सकते हैं। मुक्तासन अभ्यास का उद्देश्य ब्रह्म-भूत स्तर तक आना है, क्योंकि ब्रह्म-भूत स्तर पर आए बिना व्यक्ति आध्यात्मिक आकाश में पदोन्नत नहीं हो सकता है। जैसा कि भगवद्-गीता (14.26) में कहा गया है:
माँ च योव्यभिचारेण
भक्ति-योगेन सेवते
स गुणान समतीत्यैतान
ब्रह्म-भूयाय कल्पते
भक्ति-योगी, भक्ति-योग का अभ्यास करते हुए, हमेशा ब्रह्म-भूत स्तर (ब्रह्म-भूयाय कल्पते) पर स्थित रहता है। यदि कोई भक्त ब्रह्म-भूत मंच पर बना रहने में सक्षम है, तो वह मृत्यु के बाद स्वतः ही आध्यात्मिक आकाश में प्रवेश करता है और भगवान के पास लौट जाता है। इसलिए एक भक्त को कुंडलिनी-चक्र का अभ्यास न करने या एक के बाद एक छह चक्रों को भेदने के लिए दुखी होने की आवश्यकता नहीं है। जहाँ तक महाराजा पृथु का सवाल है, उन्होंने पहले से ही इस प्रक्रिया का अभ्यास किया था, और चूँकि वह उस समय का इंतजार नहीं करना चाहते थे जब उनकी मृत्यु स्वाभाविक रूप से होगी, उन्होंने षट-चक्र भेदन प्रक्रिया का लाभ उठाया और इस प्रकार अपनी मर्जी से शरीर त्याग दिया और तुरंत आध्यात्मिक आकाश में प्रवेश किया।
