अन्यभिलाषिता-शून्यं
ज्ञान-कर्मद्य-अनावृतम्
अनुकूल्येन कृष्णा अनु-
शीलनं भक्तिर उत्तमा
वास्तविक ज्ञान का अर्थ है यह समझना कि जीव भगवान का शाश्वत सेवक है। यह ज्ञान कई, कई जन्मों के बाद प्राप्त किया जाता है, जैसा कि भगवद् गीता (7.19) में पुष्टि की गई है: बहुनां जन्मनाम् अन्ते ज्ञानवान् माम प्रपद्यते। जीवन के परमहंस चरण में, व्यक्ति पूरी तरह से कृष्ण को सब कुछ के रूप में महसूस करता है: वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः। जब कोई पूरी तरह से समझ जाता है कि कृष्ण ही सब कुछ है और कृष्ण चेतना जीवन की सर्वोच्च पूर्णता है, तो वह एक परमहंस, या महात्मा बन जाता है। ऐसा महात्मा या परमहंस मिलना बहुत दुर्लभ है। एक परमहंस, या शुद्ध भक्त, कभी भी हठ-योग या सट्टा ज्ञान से आकर्षित नहीं होता है। वह बस भगवान की अमिश्र भक्ति सेवा में रुचि रखता है। कभी-कभी जो कोई पहले इन प्रक्रियाओं का आदी था, वह भक्ति सेवा और ज्ञान और योग अभ्यासों को एक ही समय में करने की कोशिश करता है, लेकिन जैसे ही कोई भक्ति सेवा के अमिश्र अवस्था में आता है, वह आत्म-साक्षात्कार के अन्य सभी तरीकों को छोड़ने में सक्षम हो जाता है। दूसरे शब्दों में, जब कोई दृढ़ता से कृष्ण को सर्वोच्च लक्ष्य के रूप में महसूस करता है, तो वह अब रहस्यवादी योग अभ्यास या ज्ञान के सट्टा अनुभवजन्य तरीकों से आकर्षित नहीं होता है।
