श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 23: महाराज पृथु का भगवद्धाम गमन  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  4.23.12 
छिन्नान्यधीरधिगतात्मगतिर्निरीह-
स्तत्तत्यजेऽच्छिनदिदं वयुनेन येन ।
तावन्न योगगतिभिर्यतिरप्रमत्तो
यावद्गदाग्रजकथासु रतिं न कुर्यात् ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
जब महाराज पृथु पूर्ण रूप से शरीर के साथ अपने अस्तित्व के विचार से मुक्त हो गये, तो उन्होंने भगवान श्री कृष्ण को परमात्मा के रूप में देखा जो हर किसी के दिल में निवास करते हैं। इस प्रकार उनसे सभी आदेश प्राप्त करने में सक्षम होकर उन्होंने योग और ज्ञान की अन्य सभी विधियों को त्याग दिया। ज्ञान और योग की सिद्धियों में भी उनकी रुचि नहीं रही, क्योंकि उन्होंने पूरी तरह से अनुभव किया कि जीवन का चरम लक्ष्य श्री कृष्ण की भक्ति है और जब तक योगी और ज्ञानी कृष्ण-कथा के प्रति आकर्षित नहीं होते, संसार के बारे में उनके सभी भ्रम (मोह) कभी भी दूर नहीं हो सकते।
 
When Maharaja Prithu was completely freed from the bodily consciousness, he saw Lord Sri Krishna as the Supersoul situated in everyone's heart. Being thus able to receive all instructions from Him, he abandoned all other methods of yoga and knowledge. He also lost interest in knowledge and the attainments of yoga, because he fully realized that the ultimate goal of life is devotion to Sri Krishna and unless the yogis and the wise are attracted to the story of Krishna, all their illusions (delusions) about the world can never be dispelled.
तात्पर्य
जब तक एक व्यक्ति जीवन की शारीरिक अवधारणा में बहुत अधिक लीन रहता है, वह आत्म-साक्षात्कार की कई अलग-अलग प्रक्रियाओं में रुचि रखता है, जैसे रहस्यमय योग प्रणाली या सट्टा अनुभवजन्य तरीकों का उपयोग करने वाली प्रणाली। हालाँकि, जब कोई यह समझता है कि जीवन का अंतिम लक्ष्य कृष्ण से संपर्क करना है, तो वह हर किसी के हृदय में कृष्ण को महसूस करता है और इसलिए हर उस व्यक्ति की मदद करता है जो कृष्ण चेतना में रुचि रखता है। वास्तव में जीवन की पूर्णता कृष्ण के बारे में सुनने के किसी के झुकाव पर निर्भर करती है। इसलिए इस छंद में उल्लेख किया गया है, यावद गदाग्रज-कथासु रति न कुर्यात्: जब तक कोई कृष्ण में, उनके मनोरंजन और गतिविधियों में रुचि नहीं लेता, तब तक योग अभ्यास या सट्टा ज्ञान के माध्यम से मुक्ति का कोई प्रश्न नहीं है। भक्ति के स्तर पर पहुँचने के बाद, महाराज पृथु ज्ञान और योग के अभ्यास में अरुचिकर हो गए और उन्हें त्याग दिया। यह शुद्ध भक्ति जीवन का वह चरण है जैसा कि रूप गोस्वामी ने वर्णित किया है:

अन्यभिलाषिता-शून्यं

ज्ञान-कर्मद्य-अनावृतम्

अनुकूल्येन कृष्णा अनु-

शीलनं भक्तिर उत्तमा

वास्तविक ज्ञान का अर्थ है यह समझना कि जीव भगवान का शाश्वत सेवक है। यह ज्ञान कई, कई जन्मों के बाद प्राप्त किया जाता है, जैसा कि भगवद् गीता (7.19) में पुष्टि की गई है: बहुनां जन्मनाम् अन्ते ज्ञानवान् माम प्रपद्यते। जीवन के परमहंस चरण में, व्यक्ति पूरी तरह से कृष्ण को सब कुछ के रूप में महसूस करता है: वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः। जब कोई पूरी तरह से समझ जाता है कि कृष्ण ही सब कुछ है और कृष्ण चेतना जीवन की सर्वोच्च पूर्णता है, तो वह एक परमहंस, या महात्मा बन जाता है। ऐसा महात्मा या परमहंस मिलना बहुत दुर्लभ है। एक परमहंस, या शुद्ध भक्त, कभी भी हठ-योग या सट्टा ज्ञान से आकर्षित नहीं होता है। वह बस भगवान की अमिश्र भक्ति सेवा में रुचि रखता है। कभी-कभी जो कोई पहले इन प्रक्रियाओं का आदी था, वह भक्ति सेवा और ज्ञान और योग अभ्यासों को एक ही समय में करने की कोशिश करता है, लेकिन जैसे ही कोई भक्ति सेवा के अमिश्र अवस्था में आता है, वह आत्म-साक्षात्कार के अन्य सभी तरीकों को छोड़ने में सक्षम हो जाता है। दूसरे शब्दों में, जब कोई दृढ़ता से कृष्ण को सर्वोच्च लक्ष्य के रूप में महसूस करता है, तो वह अब रहस्यवादी योग अभ्यास या ज्ञान के सट्टा अनुभवजन्य तरीकों से आकर्षित नहीं होता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)