मां च योऽव्यभिचारेण
भक्ति-योगेन सेवते
स गुणान् समतीत्यैतान
ब्रह्म-भूयाय कल्पते
"जो पूर्ण भक्तिमय सेवा में लगा हुआ है, सभी परिस्थितियों में अडिग, वह भौतिक प्रकृति के गुणों को तुरंत पार कर जाता है और इस तरह ब्राह्मण के स्तर पर आ जाता है।" भक्तिमय सेवा के नियमित निर्वहन के कारण, एक भक्त जीवन की पारलौकिक अवस्था को प्राप्त करता है। चूँकि उसका मन पारलौकिक रूप से स्थित होता है, वह प्रभु के चरण-कमलों के अलावा कुछ भी नहीं सोच सकता। यही संसारण-अनूपूर्त्य शब्द का अर्थ है। प्रभु के चरण-कमलों के बारे में लगातार सोचने से, भक्त तुरंत शुद्ध-सत्व में स्थित हो जाता है। शुद्ध-सत्व उस मंच को संदर्भित करता है जो भौतिक प्रकृति के गुणों से ऊपर है, जिसमें अच्छाई का भाव भी शामिल है। भौतिक दुनिया में, अच्छाई के भाव को सर्वोच्च पूर्णता का प्रतिनिधि माना जाता है, लेकिन व्यक्ति को इस भाव से परे जाना होगा और शुद्ध-सत्व, या शुद्ध अच्छाई की अवस्था में आना होगा, जहाँ भौतिक प्रकृति के तीन गुण कार्य नहीं कर सकते।
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर निम्न उदाहरण देते हैं: यदि किसी की पाचन शक्ति प्रबल हो, तो खाने के बाद वह अपने पेट में अपने आप आग जलाता है जिससे सारी चीजें हजम हो जाती हैं और उसे उनके पाचन में सहायता के लिए दवा लेने की जरूरत नहीं होती। इसी प्रकार, भक्ति सेवा की आग इतनी प्रबल है कि एक भक्त को परिपूर्ण ज्ञान या भौतिक आकर्षण से अनासक्ति प्राप्त करने के लिए अलग से कोई कार्य करने की जरूरत नहीं पड़ती। एक ज्ञानी ज्ञान के विषयों पर लंबी चर्चाओं द्वारा भौतिक आकर्षण से अनासक्त हो सकता है और इस प्रकार अंत में ब्रह्म-भूत स्तर पर आ सकता है, परंतु एक भक्त को इतनी तकलीफ उठाने की जरूरत नहीं होती। अपनी भक्ति सेवा के कारण, वह निःसंदेह ब्रह्म-भूत स्तर को प्राप्त कर लेता है। योगी और ज्ञानी अपनी आध्यात्मिक स्थिति के बारे में हमेशा संदेह में रहते हैं; इसलिए वे भगवान के साथ एक हो जाने के बारे में गलतफहमी रखते हैं। हालाँकि, भगवान के साथ एक भक्त का संबंध संदेह से परे प्रकट हो जाता है, और वह तुरंत समझ जाता है कि उसकी स्थिति भगवान का शाश्वत सेवक है। बिना भक्ति वाले ज्ञानी और योगी खुद को मुक्त मान सकते हैं, परंतु असल में उनकी बुद्धि एक भक्त की तरह पवित्र नहीं है। दूसरे शब्दों में कहें तो, ज्ञानी और योगी तब तक वास्तव में मुक्त नहीं हो सकते जब तक कि वे भक्तों की स्थिति तक नहीं पहुँच जाते:
आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः
पतन्त्य अधो ’नादृत-युष्मद-अंघ्रयः
(भागवत 10.2.32)
ज्ञान और योगी उच्चतम स्थिति, ब्रह्म साक्षात्कार तक पहुँच सकते हैं, परंतु भगवान के चरणकमलों के प्रति उनकी भक्ति की कमी के कारण, वे फिर से भौतिक प्रकृति में गिर जाते हैं। इसलिए ज्ञान और योग को मुक्ति के लिए वास्तविक प्रक्रिया के रूप में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। भक्ति सेवा का निर्वहन करने से, महाराज पृथु ने इन सभी स्थितियों को अपने आप पार कर लिया। चूँकि महाराज पृथु परम भगवान के शक्त्यावेश अवतार थे, उन्हें मुक्ति प्राप्त करने के लिए किसी भी तरह से कार्य करने की आवश्यकता नहीं थी। वह भगवान की इच्छा को पृथ्वी पर क्रियान्वित करने के लिए वैकुंठ लोक या आध्यात्मिक आकाश से आए थे। परिणामस्वरूप, उन्हें ज्ञान, योग या कर्म का पालन किए बिना ही घर, वापस भगवान के पास लौटना था। हालाँकि पृथु महाराज भगवान के सनातन शुद्ध भक्त थे, फिर भी उन्होंने जीवन के कर्तव्यों को निष्पादित करने और अंततः घर, वापस भगवान के पास लौटने की उचित प्रक्रिया को लोगों को सामान्य रूप से सिखाने के लिए भक्ति सेवा की प्रक्रिया को अपनाया।
