श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 2: दक्ष द्वारा शिवजी को शाप  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  4.2.33 
मैत्रेय उवाच
तस्यैवं वदत: शापं भृगो: स भगवान् भव: ।
निश्चक्राम तत: किञ्चिद्विमना इव सानुग: ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
मैत्रेय मुनि ने कहा : जब शिवजी के अनुयायियों तथा दक्ष और भृगु के समर्थकों के बीच शाप-प्रतिशाप का दौर चल रहा था, तो शिवजी बहुत ही उदास हो गए और बिना कुछ बोले अपने शिष्यों के साथ यज्ञस्थल छोड़कर चले गए।
 
Maitreya Muni said: When the curses and counter-curses were going on between the followers of Lord Shiva and the supporters of Daksha and Bhrigu, Lord Shiva became very upset and without saying anything, left the place of sacrifice along with his disciples.
तात्पर्य
यहाँ भगवान शिव के उत्कृष्ट चरित्र का वर्णन किया गया है। दक्ष और शिव के पक्षों के बीच होने वाले शाप देने और शाप लेने के बावजूद, क्योंकि वह सबसे बड़े वैष्णव हैं, वह इतने शांत थे कि उन्होंने कुछ नहीं कहा। वैष्णव हमेशा सहिष्णु होते हैं, और भगवान शिव को सर्वोच्च वैष्णव माना जाता है, इसलिए इस दृश्य में दिखाए गए उनके चरित्र उत्कृष्ट हैं। वह उदास हो गए क्योंकि वह जानते थे कि ये लोग, उनके और दक्ष दोनों के, अनावश्यक रूप से शाप दे रहे थे और शाप ले रहे थे, बिना आध्यात्मिक जीवन में कोई दिलचस्पी लिए। अपने दृष्टिकोण से, वह किसी को भी नीचा या ऊँचा नहीं देखते थे, क्योंकि वह वैष्णव हैं। जैसा कि भगवद्-गीता (5.18) में कहा गया है, पंडिताः सम-दर्शिनः: जो पूरी तरह से सीखा है वह किसी को भी छोटा या बड़ा नहीं देखता, क्योंकि वह हर किसी को आध्यात्मिक स्तर पर देखता है। इस प्रकार भगवान शिव के पास केवल एक ही विकल्प बचा था, वह यह था कि वह अपने अनुयायी नंदीश्वर, साथ ही भृगु मुनि को उस तरह से शाप देने और शाप लेने से रोकने के लिए चले जाएँ।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)