श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 2: दक्ष द्वारा शिवजी को शाप  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  4.2.1 
विदुर उवाच
भवे शीलवतां श्रेष्ठे दक्षो दुहितृवत्सल: ।
विद्वेषमकरोत्कस्मादनाद‍ृत्यात्मजां सतीम् ॥ १ ॥
 
 
अनुवाद
विदुर ने प्रश्न किया: दक्ष जो अपनी पुत्री से अति स्नेह करता था, सज्जनों में सर्वश्रेष्ठ भगवान शिव से ईर्ष्यालु क्यों था? उसने अपनी पुत्री सती का अपमान क्यों किया?
 
Vidura asked: Why was Daksha, who was so affectionate towards his daughter, so jealous of Lord Shiva, the best of the virtuous? Why did he disrespect his daughter Sati?
तात्पर्य
चतुर्थ स्कंध के दूसरे अध्याय में भगवान शिव और दक्ष के बीच के मतभेद का कारण बताया गया, जिसकी वजह से पूरे ब्रह्मांड को शांत करने के लिए दक्ष द्वारा एक बड़े यज्ञ की व्यवस्था की गयी थी। भगवान शिव का वर्णन यहाँ कोमल स्वभाव वालों में श्रेष्ठ के रूप में किया गया क्योंकि उन्हें किसी से ईर्ष्या नहीं होती, वे सभी जीवों के समान हैं, और उनके व्यक्तित्व में सभी अन्य अच्छे गुण मौजूद हैं। शिव शब्द का अर्थ है "सर्व-कल्याणकारी"। भगवान शिव का कोई भी दुश्मन नहीं हो सकता क्योंकि वे इतने शांतचित्त और वैरागी हैं कि वे अपने लिए निवास तक का निर्माण नहीं करते, बल्कि हमेशा पेड़ के नीचे रहते हैं, जो हमेशा सभी सांसारिक चीजों से अलग रहते हैं। भगवान शिव का व्यक्तित्व सौम्यता के सबसे अच्छे गुण का प्रतीक है। फिर दक्ष, जिन्होंने अपनी प्रिय बेटी को ऐसे कोमल स्वभाव वाले व्यक्तित्व को अर्पित किया, भगवान शिव से इतनी तीव्रता से दुश्मनी क्यों कर रहा था कि दक्ष की बेटी और भगवान शिव की पत्नी सती ने अपना शरीर त्याग दिया?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)