श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 19: राजा पृथु के एक सौ अश्वमेध यज्ञ  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  4.19.23 
यानि रूपाणि जगृहे इन्द्रो हयजिहीर्षया ।
तानि पापस्य खण्डानि लिङ्गं खण्डमिहोच्यते ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
इंद्र ने संन्यासी के जो विभिन्न रूप धारण किए, वे सभी नास्तिकता के दर्शन के प्रतीक थे।
 
The various forms of the ascetic that Indra assumed in order to steal the horse are symbols of the philosophy of atheism.
तात्पर्य
वैदिक सभ्यता के अनुसार, संन्यास वर्णाश्रम संस्था के कार्यक्रम में से एक आवश्यक वस्तु है। संन्यास को आचार्यों की परंपरा प्रणाली के अनुसार स्वीकार करना चाहिए। हालाँकि, वर्तमान समय में, कई तथाकथित संन्यासी या भिखारी भगवान की चेतना को नहीं समझते हैं। ऐसा संन्यास इंद्र ने महाराज प्रिथु से ईर्ष्या के कारण प्रस्तुत किया था, और जो उन्होंने प्रस्तुत किया वह फिर से कलियुग में प्रकट हो रहा है। इस युग में व्यावहारिक रूप से कोई भी संन्यासी सद्भावनापूर्ण नहीं हैं। कोई भी वैदिक जीवन पद्धति में किसी भी नई व्यवस्था को प्रस्तुत नहीं कर सकता है; यदि कोई द्वेष के कारण ऐसा करता है, तो उसे पाषंडी या नास्तिक के रूप में जाना जाता है। वैष्णव तंत्र में कहा गया है:

यः तु नारायणं देवम्

ब्रह्म-रुद्रादि-दैवतैः

समत्वेनेव वीक्षेत

स पाषंडी भवेद् ध्रुवम्

हालांकि यह निषिद्ध है, वहाँ कई पाषंडी हैं जो दरिद्र-नारायण और स्वामी-नारायण जैसे शब्द गढ़ते हैं, हालाँकि ब्रह्मा और शिव जैसे देवता भी नारायण के समान नहीं हो सकते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)