तदभिप्रेत्य भगवान् कर्मातिशयमात्मन: ।
शतक्रतुर्न ममृषे पृथोर्यज्ञमहोत्सवम् ॥ २ ॥
अनुवाद
जब इन्द्र ने यह देखा कि सकाम कर्मों में राजा पृथु उससे आगे निकलने जा रहा है, तो वह इससे सहन नहीं कर सका। वह पृथु के द्वारा कराये जा रहे यज्ञ-महोत्सव को रोकना चाहता था।
When the most powerful king of heaven Indra saw this, he thought that King Prithu was going to beat him in the worldly activities. Therefore, he could not tolerate the Yagya Mahotsav being performed by King Prithu.
तात्पर्य
भौतिक जगत में कोई भी जो अपने आपको आनंदित करने या भौतिक प्रकृति पर शासन करने आता है वह दूसरों से ईर्ष्या करता है। यह ईर्ष्या स्वर्ग के राजा, इंद्र के व्यक्तित्व में भी पाई जाती है। जैसा कि प्रकट शास्त्रों से स्पष्ट है, इंद्र कई बार कई व्यक्तियों से ईर्ष्या करते थे। वह महान फलदायी गतिविधियों और योग क्रियाओं, या सिद्धियों से विशेष रूप से ईर्ष्या करता था। वास्तव में, वह उन्हें बर्दाश्त नहीं कर सकता था, और वह उन्हें तोड़ना चाहता था। वह इस डर से ईर्ष्या करता था कि जो लोग रहस्यमय योग के निष्पादन के लिए महान बलिदान करते हैं वे उसकी गद्दी पर कब्ज़ा कर सकते हैं। चूंकि इस भौतिक दुनिया में कोई भी दूसरे की उन्नति को बर्दाश्त नहीं कर सकता, इसलिए भौतिक दुनिया में सभी को मत्सर, ईर्ष्यालु कहा जाता है। श्रीमद-भागवतम की शुरुआत में इसलिए कहा गया है कि श्रीमद-भागवतम उन लोगों के लिए है जो पूरी तरह से निर्मतसर (निर्विवाद) हैं। दूसरे शब्दों में, जो ईर्ष्या के दोष से मुक्त नहीं है वह कृष्ण चेतना में उन्नति नहीं कर सकता। हालाँकि, कृष्ण चेतना में, यदि कोई किसी अन्य व्यक्ति से आगे निकल जाता है, तो वह भक्त जो उत्कृष्ट है, सोचता है कि भक्ति सेवा में आगे बढ़ने के लिए दूसरा व्यक्ति कितना भाग्यशाली है। इस तरह की गैर-ईर्ष्या वैकुण्ठ की विशिष्ट है। हालाँकि, जब कोई अपने प्रतिद्वंद्वी से ईर्ष्या करता है, तो वह भौतिक होता है। भौतिक दुनिया में तैनात देवता ईर्ष्या से मुक्त नहीं हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥