इस श्लोक में प्रयुक्त शब्द पाखण्ड कभी-कभी पाषण्ड उच्चारित किया जाता है। ये दोनों ही शब्द एक ऐसे ढोंगी व्यक्ति को इंगित करते हैं जो स्वयं को एक अति धार्मिक व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है लेकिन वास्तव में पापी होता है। इंद्र ने दूसरों को धोखा देने के लिए भगवा वस्त्र धारण किया। इस भगवा वस्त्र का कई ढोंगी लोगों ने दुरुपयोग किया है जो स्वयं को मुक्त व्यक्ति या भगवान के अवतार के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इस तरह लोगों को धोखा दिया जाता है। जैसा कि हमने कई बार उल्लेख किया है, शर्तों में बंधी आत्मा में धोखा देने की प्रवृत्ति होती है; इसलिए यह गुण राजा इंद्र जैसे व्यक्ति में भी दिखाई देता है। यह समझा जाता है कि राजा इंद्र भी भौतिक संदूषण के चंगुल से मुक्त नहीं है। इस प्रकार, आमूक्त इव शब्दों का प्रयोग किया जाता है, जिसका अर्थ है "जैसे कि वह मुक्त हो"। एक संन्यासी द्वारा पहने जाने वाले भगवा वस्त्र दुनिया को घोषणा करते हैं कि उसने सभी सांसारिक मामलों को त्याग दिया है और केवल भगवान की सेवा में लगा हुआ है। ऐसा भक्त वास्तव में एक संन्यासी या मुक्त व्यक्ति होता है। भगवद-गीता (6.1) में कहा गया है:
अनाश्रितः कर्म-फलं
कार्यं कर्म करोति यः
स संन्यासी च योगी च
न निराग्निर्न चाक्रियः
"वह व्यक्ति जो अपने काम के फलों से अनासक्त है और वह काम करता है जो करना उसका कर्तव्य है, वह संन्यास के जीवन क्रम में है और वह सच्चा रहस्यवादी है, न कि वह जो कोई आग नहीं जलाता है और कोई काम नहीं करता है।"
दूसरे शब्दों में, जो व्यक्ति अपनी गतिविधियों के परिणाम सर्वोच्च भगवान को अर्पित करता है, वह वास्तव में एक संन्यासी और योगी है। धोखेबाज संन्यासी और योगी पृथु महाराज के बलिदान के समय से चले आ रहे हैं। यह धोखा बहुत ही मूर्खतापूर्ण तरीके से राजा इंद्र द्वारा शुरू किया गया था। कुछ युगों में ऐसा धोखा बहुत प्रमुख होता है, और अन्य युगों में इतना प्रमुख नहीं होता है। एक संन्यासी का कर्तव्य बहुत सतर्क रहना है क्योंकि, जैसा कि भगवान चैतन्य ने कहा है, संन्यासीर अल्प चित्त्र सर्व-लोके गया: "एक संन्यासी के चरित्र में एक छोटा सा धब्बा भी जनता द्वारा बड़ा किया जाएगा।" (चैतन्य चरितामृत मध्य 12.51) इसलिए जब तक कोई व्यक्ति बहुत ईमानदार और गंभीर न हो, उसे संन्यास ग्रहण नहीं करना चाहिए। किसी को भी इस आदेश का उपयोग जनता को धोखा देने के लिए नहीं करना चाहिए। कलियुग में संन्यास न लेना ही बेहतर है क्योंकि इस युग में उत्तेजनाएँ बहुत प्रबल होती हैं। केवल एक बहुत ही ऊँचा व्यक्ति जो आध्यात्मिक समझ में उन्नत है, उसे संन्यास लेने का प्रयास करना चाहिए। किसी को भी इस आदेश को आजीविका के साधन के रूप में या किसी भौतिक उद्देश्य के लिए नहीं अपनाना चाहिए।
