श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 14: राजा वेन की कथा  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  4.14.32 
नायमर्हत्यसद्‍वृत्तो नरदेववरासनम् ।
योऽधियज्ञपतिं विष्णुं विनिन्दत्यनपत्रप: ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
ऋषि आगे बोले: यह पापी, ढीठ व्यक्ति किसी भी तरह से सिंहासन पर बैठने के लायक नहीं है। यह इतना निर्लज्ज है कि उसने भगवान विष्णु का भी अपमान करने का साहस किया है।
 
ऋषि आगे बोले: यह पापी, ढीठ व्यक्ति किसी भी तरह से सिंहासन पर बैठने के लायक नहीं है। यह इतना निर्लज्ज है कि उसने भगवान विष्णु का भी अपमान करने का साहस किया है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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