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श्लोक 4.14.10  |
अहेरिव पय:पोष: पोषकस्याप्यनर्थभृत् ।
वेन: प्रकृत्यैव खल: सुनीथागर्भसम्भव: ॥ १० ॥ |
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| अनुवाद |
| ऋषिगण आपस में विचार करने लगे कि सुनीथा के गर्भ से उत्पन्न होने के कारण राजा वेन जन्मजात ही बहुत दुष्ट है। ऐसे दुष्ट राजा का समर्थन करना बिल्कुल दूध पिलाकर सर्प का पालन करने के समान है। अब वह सबके लिए संकटों का कारण बन गया है। |
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| ऋषिगण आपस में विचार करने लगे कि सुनीथा के गर्भ से उत्पन्न होने के कारण राजा वेन जन्मजात ही बहुत दुष्ट है। ऐसे दुष्ट राजा का समर्थन करना बिल्कुल दूध पिलाकर सर्प का पालन करने के समान है। अब वह सबके लिए संकटों का कारण बन गया है। |
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