श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 1: मनु की पुत्रियों की वंशावली  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  4.1.66 
पितर्यप्रतिरूपे स्वे भवायानागसे रुषा ।
अप्रौढैवात्मनात्मानमजहाद्योगसंयुता ॥ ६६ ॥
 
 
अनुवाद
इसका कारण यह था कि सती के पिता, दक्ष, शिवजी के निर्दोष होने पर भी उनकी निंदा करते रहते थे। परिणामस्वरूप, परिपक्व आयु से पहले ही सती ने योगशक्ति के बल पर अपने शरीर का त्याग कर दिया था।
 
इसका कारण यह था कि सती के पिता, दक्ष, शिवजी के निर्दोष होने पर भी उनकी निंदा करते रहते थे। परिणामस्वरूप, परिपक्व आयु से पहले ही सती ने योगशक्ति के बल पर अपने शरीर का त्याग कर दिया था।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध चार के अंतर्गत पहला अध्याय समाप्त होता है ।
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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