श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 1: मनु की पुत्रियों की वंशावली  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  4.1.65 
भवस्य पत्नी तु सती भवं देवमनुव्रता ।
आत्मन: सद‍ृशं पुत्रं न लेभे गुणशीलत: ॥ ६५ ॥
 
 
अनुवाद
सती नाम की वह सोलहवीं पुत्री भगवान शंकर की पत्नी थी, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं हुई और वे हमेशा अपने पति की श्रद्धा से सेवा में लीन रहती थीं।
 
सती नाम की वह सोलहवीं पुत्री भगवान शंकर की पत्नी थी, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं हुई और वे हमेशा अपने पति की श्रद्धा से सेवा में लीन रहती थीं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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