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श्लोक 4.1.58  |
एवं सुरगणैस्तात भगवन्तावभिष्टुतौ ।
लब्धावलोकैर्ययतुरर्चितौ गन्धमादनम् ॥ ५८ ॥ |
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| अनुवाद |
| [मैत्रेय जी बोले :] हे विदुर, इस प्रकार देवताओं ने नर-नारायण ऋषि के रूप में प्रकट हुए भगवान की प्रार्थना के साथ पूजा की। भगवान ने उन पर दया की दृष्टि डाली और फिर गंधमादन पर्वत की ओर प्रस्थान कर गए। |
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| [मैत्रेय जी बोले :] हे विदुर, इस प्रकार देवताओं ने नर-नारायण ऋषि के रूप में प्रकट हुए भगवान की प्रार्थना के साथ पूजा की। भगवान ने उन पर दया की दृष्टि डाली और फिर गंधमादन पर्वत की ओर प्रस्थान कर गए। |
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