श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 1: मनु की पुत्रियों की वंशावली  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  4.1.3 
प्रजापति: स भगवान् रुचिस्तस्यामजीजनत् ।
मिथुनं ब्रह्मवर्चस्वी परमेण समाधिना ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
जीवात्माओं के जनक के रूप में नियुक्त (प्रजापति) एवं अपने ब्रह्मज्ञान में परम शक्तिशाली रुचि को उनकी पत्नी आकूति के गर्भ से एक पुत्र और एक पुत्री की प्राप्ति हुई।
 
Ruchi, who was appointed as the most powerful and the father of living beings (Prajapati) in his Brahmajnana, had a son and a daughter from the womb of his wife Akūti.
तात्पर्य
ब्रह्म-वर्चस्वी शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। रुचि एक ब्राह्मण थे और उन्होंने ब्राह्मणिक कर्तव्यों का बहुत सख़्ती से पालन किया। जैसा कि भगवद-गीता में कहा गया है, ब्राह्मणिक योग्यताएं हैं इंद्रियों पर नियंत्रण, मन पर नियंत्रण, अंदर और बाहर स्वच्छता, आध्यात्मिक और भौतिक ज्ञान का विकास, सरलता, सच्चाई, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व में विश्वास आदि। ऐसे कई गुण हैं जो एक ब्राह्मणिक व्यक्तित्व का संकेत देते हैं और यह समझा जाता है कि रुचि ने सभी ब्राह्मणिक सिद्धांतों का कड़ाई से पालन किया। इसलिए उन्हें विशेष रूप से ब्रह्म-वर्चस्वी के रूप में उल्लेखित किया गया है। जो कोई ब्राह्मण पिता से जन्म लेता है लेकिन ब्राह्मण के रूप में कार्य नहीं करता है, उसे वैदिक भाषा में ब्रह्म-बंधु कहा जाता है, और शूद्रों और महिलाओं के स्तर पर माना जाता है। इस प्रकार भागवतम में हम पाते हैं कि महाभारत को व्यासदेव ने विशेष रूप से स्त्री-शूद्र-ब्रह्म-बंधु के लिए संकलित किया था। स्त्री का अर्थ है महिलाएं, शूद्र का अर्थ है सभ्य मानव समाज का निम्न वर्ग, और ब्रह्म-बंधु का अर्थ ऐसे व्यक्ति हैं जो ब्राह्मणों के परिवारों में जन्म लेते हैं लेकिन नियमों और विनियमों का सावधानीपूर्वक पालन नहीं करते हैं। इन तीनों वर्गों को कम बुद्धिमान कहा जाता है; वेदों के अध्ययन तक उनकी पहुँच नहीं है, जो विशेष रूप से ब्राह्मणिक योग्यता प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के लिए हैं। यह प्रतिबंध किसी सांप्रदायिक भेद पर नहीं बल्कि योग्यता पर आधारित है। जब तक कि कोई ब्राह्मणिक योग्यता विकसित नहीं कर लेता है तब तक वैदिक साहित्य को समझा नहीं जा सकता है। इसलिए यह खेदजनक है कि जिन लोगों में ब्राह्मणिक योग्यता नहीं है और जिन्हें कभी भी किसी वास्तविक आध्यात्मिक गुरु के अधीन प्रशिक्षित नहीं किया गया है, फिर भी श्रीमद-भागवतम और अन्य पुराणों जैसे वैदिक साहित्य पर टिप्पणी करते हैं, क्योंकि ऐसे व्यक्ति उनका वास्तविक संदेश नहीं दे सकते हैं। रुचि को प्रथम श्रेणी का ब्राह्मण माना जाता था; इसलिए उनका यहाँ ब्रह्म-वर्चस्वी के रूप में उल्लेख किया गया है, एक व्यक्ति जिसके पास ब्राह्मणिक शक्ति में पूरी दक्षता थी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)