श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 1: मनु की पुत्रियों की वंशावली  »  श्लोक 26-27
 
 
श्लोक  4.1.26-27 
चेतस्तत्प्रवणं युञ्जन्नस्तावीत्संहताञ्जलि: ।
श्लक्ष्णया सूक्तया वाचा सर्वलोकगरीयस: ॥ २६ ॥
अत्रिरुवाच
विश्वोद्भवस्थितिलयेषु विभज्यमानै-
र्मायागुणैरनुयुगं विगृहीतदेहा: ।
ते ब्रह्मविष्णुगिरिशा: प्रणतोऽस्म्यहं व-
स्तेभ्य: क एव भवतां म इहोपहूत: ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
परंतु पहले से ही उनका हृदय उन देवताओं के प्रति लगा हुआ था, इसलिए किसी तरह होश संभालकर उन्होंने हाथ जोड़कर और मधुर शब्दों से ब्रह्मांड के सर्वश्रेष्ठ अधिष्ठाता देवताओं की स्तुति की। अत्रि मुनि ने कहा: हे ब्रह्मा, हे विष्णु और हे शिव, आपने भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों को अपनाते हुए अपने आप को तीन शरीरों में विभाजित किया है, जैसा कि आप प्रत्येक कल्प में दृश्य जगत की उत्पत्ति, पालन और विनाश के लिए करते आए हैं। मैं आप तीनों को सादर प्रणाम करता हूँ और जानना चाहता हूँ कि मेरी प्रार्थना से मैंने आपमें से किसको बुलाया था?
 
But his heart was already attracted towards these gods, so somehow he regained his senses and with folded hands he started praising the chief presiding deities of the universe in sweet words. Atri Muni said: O Brahma, O Vishnu and O Shiva, you have divided yourselves into three bodies by adopting the three modes of material nature, as you have been doing in every kalpa for the creation, maintenance and destruction of the visible world. I respectfully salute you three and I want to know which of you I called in my prayer?
तात्पर्य
ऋषि अत्रि ने जगत के ईश्वर जगदीश्वर को पुकारा। ईश्वर का होना तो सृष्टि से पहले होना ही चाहिए, अन्यथा वे उस सृष्टि के ईश्वर कैसे हो सकते हैं? मान लीजिए कि कोई एक बड़े भवन का निर्माण करता है, तो इसका मतलब यह हुआ कि भवन के बनने से पहले उसका अस्तित्व था। तो इसी प्रकार, सृष्टि के निर्माता परमात्मा को तो प्रकृति के जड़ गुणों से परे होना चाहिए। किन्तु यह तो विदित है कि विष्णु सत्त्वगुण के अधिपति हैं, ब्रह्मा रजोगुण के अधिपति हैं और भगवान शिव तमोगुण के अधिपति हैं। इसलिए अत्रि मुनि ने कहा, ``यह जगदीश्वर, सृष्टि के ईश्वर, आप तीनों में से कोई एक अवश्य ही होना चाहिए परन्तु चूँकि आप तीनों हैं इसलिए मैं यह नहीं पहचान पा रहा कि मैंने किसे पुकारा है। आप सभी अत्यन्त दयालु हैं। कृपा करके मुझे बताइए कि वास्तव में जगत के ईश्वर, जगदीश्वर, कौन हैं।`` वास्तव में, अत्रि ऋषि परमात्मा विष्णु की वास्तविक स्थिति के बारे में सन्देह में थे, परन्तु वे इस बात के प्रति पूर्णतः सचेत थे कि सृष्टि के ईश्वर माया के द्वारा निर्मित प्राणियों में से कोई नहीं हो सकता। उनके द्वारा यह पता करने के लिए पूछताछ की जा रही थी कि उन्होंने किसे पुकारा है, यह इस बात का संकेत था कि वे ईश्वर की वास्तविक स्थिति के प्रति सन्देह में थे। इसलिए उन्होंने तीनों से प्रार्थना की, ``कृपा करके मुझे बताइए कि सृष्टि के उस परम ईश्वर कौन हैं।`` निश्चित रूप से, वे जानते थे कि वे तीनों ईश्वर नहीं हो सकते परन्तु सृष्टि के ईश्वर इन तीनों में से ही कोई एक है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)