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श्लोक 4.1.20  |
शरणं तं प्रपद्येऽहं य एव जगदीश्वर: ।
प्रजामात्मसमां मह्यं प्रयच्छत्विति चिन्तयन् ॥ २० ॥ |
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| अनुवाद |
| वे मन ही मन सोच रहे थे कि मैं जिस परमेश्वर की शरण में आया हूँ और जो सम्पूर्ण जगत का स्वामी है, हे प्रभु! आप मुझ पर प्रसन्न होकर मुझे अपने समान ही एक पुत्र प्रदान करें। |
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| वे मन ही मन सोच रहे थे कि मैं जिस परमेश्वर की शरण में आया हूँ और जो सम्पूर्ण जगत का स्वामी है, हे प्रभु! आप मुझ पर प्रसन्न होकर मुझे अपने समान ही एक पुत्र प्रदान करें। |
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