श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 4: विदुर का मैत्रेय के पास जाना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  3.4.8 
वाम ऊरावधिश्रित्य दक्षिणाङ्‌घ्रि सरोरुहम् ।
अपाश्रितार्भकाश्वत्थमकृशं त्यक्तपिप्पलम् ॥ ८ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान अपनी दाहिनी कमलपाद को अपनी बाईं जंघा पर रख कर एक नन्हें बरगद वृक्ष के आधार पर सुस्ताते हुए बैठे हुए थे। यद्यपि, उन्होंने सभी घरेलू सुखोपभोगों का त्याग कर दिया था फिर भी वे उस अवस्था में पूर्णता प्रसन्नचित दिखाई पड़ रहे थे।
 
The Lord was sitting with His right lotus foot resting on His left thigh, leaning against a small banyan tree. Though He had given up all household pleasures, He appeared perfectly happy in that posture.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, भगवान का बैठने का आसन भी अर्थपूर्ण है, जिसमें वह अपने पीठ को नई उगी वट वृक्ष की ओर रख कर बैठे हैं। वट वृक्ष को अश्वत्थ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह वृक्ष शीघ्र नहीं मरता, यह अनेक वर्षों तक जीवित रहता है। उनके पैर तथा उनकी ऊर्जाएँ पाँच भौतिक तत्व हैं: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। वट वृक्ष द्वारा प्रदर्शित भौतिक ऊर्जाएँ उनकी बाह्य शक्ति के उत्पाद हैं और इसलिए उसे उनकी पीठ की ओर रखा गया है। और क्योंकि यह विशिष्ट ब्रह्मांड सभी ब्रह्माण्डों में सबसे छोटा है, इसलिए वट वृक्ष को छोटा या बालक कहा गया है। त्याक्त-पिप्पलम इंगित करता है कि उन्होंने अपने इस अत्यंत छोटे ब्रह्मांड में अपने लीलाएँ समाप्त कर ली थीं, परंतु क्योंकि भगवान पूर्ण और सदा आनंदित हैं, इसलिए उनके छोड़ने या कुछ ग्रहण करने में कोई अंतर नहीं है। भगवान अब इस विशेष ब्रह्मांड को छोड़ने और दूसरे ब्रह्मांड में जाने के लिए तैयार थे, ठीक वैसे ही जैसे सूर्य किसी एक विशेष ग्रह में उदय होता है और उसी समय दूसरे ग्रह में अस्त होता है, परंतु इसकी अपनी स्थिति नहीं बदलती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)