श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 4: विदुर का मैत्रेय के पास जाना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.4.14 
इत्याद‍ृतोक्त: परमस्य पुंस:
प्रतिक्षणानुग्रहभाजनोऽहम् ।
स्‍नेहोत्थरोमा स्खलिताक्षरस्तं
मुञ्चञ्छुच: प्राञ्जलिराबभाषे ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
उद्धव ने कहा: हे विदुर, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण की उस कृपा से मैं हर क्षण धन्य हो रहा था और वे मुझसे बड़े प्यार से बात कर रहे थे। तब मैं बोल नहीं पाया और रोने लगा। मेरे शरीर के रोंगटे भी खड़े हो गए। मैंने अपने आँसू पोंछे और हाथ जोड़कर उन्हें उत्तर दिया।
 
Uddhava said: O Vidura, when I was thus blessed every moment by the Supreme Personality of Godhead and was being addressed by Him with the utmost affection, my speech stopped and tears flowed out and the hair on my body stood up. Wiping my tears and joining my hands, I spoke thus.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)