श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 29: भगवान् कपिल द्वारा भक्ति की व्याख्या  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.29.20 
यथा वातरथो घ्राणमावृङ्क्ते गन्ध आशयात् ।
एवं योगरतं चेत आत्मानमविकारि यत् ॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार आकाश का रथ सुगंध को उसके स्रोत से लेकर जाती है और वह तुरंत घ्राणेंद्रियों तक पहुँचती है, उसी प्रकार जो व्यक्ति लगातार कृष्ण भक्ति में लीन रहता है, वह परम आत्मा को प्राप्त कर लेता है, जो हर जगह समान रूप से विद्यमान है।
 
जिस प्रकार आकाश का रथ सुगंध को उसके स्रोत से लेकर जाती है और वह तुरंत घ्राणेंद्रियों तक पहुँचती है, उसी प्रकार जो व्यक्ति लगातार कृष्ण भक्ति में लीन रहता है, वह परम आत्मा को प्राप्त कर लेता है, जो हर जगह समान रूप से विद्यमान है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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