श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.28.5 
मौनं सदासनजय: स्थैर्यं प्राणजय: शनै: ।
प्रत्याहारश्चेन्द्रियाणां विषयान्मनसा हृदि ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य को या तो इन विधियों अथवा किसी अन्य उपयुक्त विधि से अपने मन को नियंत्रण में करना चाहिए, जो भौतिक भोगों के कारण सदैव ही अस्थिर और खिंचा हुआ रहता है, और इस प्रकार स्वयं को भगवान के चिन्तन में एकाग्रचित करना चाहिए।
 
मनुष्य को या तो इन विधियों अथवा किसी अन्य उपयुक्त विधि से अपने मन को नियंत्रण में करना चाहिए, जो भौतिक भोगों के कारण सदैव ही अस्थिर और खिंचा हुआ रहता है, और इस प्रकार स्वयं को भगवान के चिन्तन में एकाग्रचित करना चाहिए।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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