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श्लोक 3.28.44  |
तस्मादिमां स्वां प्रकृतिं दैवीं सदसदात्मिकाम् ।
दुर्विभाव्यां पराभाव्य स्वरूपेणावतिष्ठते ॥ ४४ ॥ |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार माया के पार जाना ही योगी के लिए आत्मसाक्षात्कार की स्थिति है। यह माया इस भौतिक सृष्टि में स्वयं को कारण और प्रभाव दोनों के रूप में प्रस्तुत करती है और इसलिए इसे समझ पाना बहुत मुश्किल है। |
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| इस प्रकार माया के पार जाना ही योगी के लिए आत्मसाक्षात्कार की स्थिति है। यह माया इस भौतिक सृष्टि में स्वयं को कारण और प्रभाव दोनों के रूप में प्रस्तुत करती है और इसलिए इसे समझ पाना बहुत मुश्किल है। |
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| इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध तीन के अंतर्गत अट्ठाईसवाँ अध्याय समाप्त होता है । |
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