श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  3.28.40 
यथोल्मुकाद्विस्फुलिङ्गाद्धूमाद्वापि स्वसम्भवात् ।
अप्यात्मत्वेनाभिमताद्यथाग्नि: पृथगुल्मुकात् ॥ ४० ॥
 
 
अनुवाद
प्रज्वलित अग्नि, ज्वाला से, चिनगारी से और धुएँ से अलग है, हालाँकि ये सभी इससे निकटता से जुड़े हुए हैं क्योंकि ये सभी एक ही प्रज्वलित लकड़ी से उत्पन्न होते हैं।
 
प्रज्वलित अग्नि, ज्वाला से, चिनगारी से और धुएँ से अलग है, हालाँकि ये सभी इससे निकटता से जुड़े हुए हैं क्योंकि ये सभी एक ही प्रज्वलित लकड़ी से उत्पन्न होते हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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