श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.28.4 
अहिंसा सत्यमस्तेयं यावदर्थपरिग्रह: ।
ब्रह्मचर्यं तप: शौचं स्वाध्याय: पुरुषार्चनम् ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य को हिसा से दूर रहकर, सच बोलना चाहिए, चोरी नहीं करनी चाहिए और केवल अपने जीवन यापन के लिए जितना चाहिए उतना ही संग्रह करना चाहिए। उसे सेक्स जीवन से दूर रहना चाहिए, तपस्या करनी चाहिए, स्वच्छ रहना चाहिए, वेदों का अध्ययन करना चाहिए और भगवान् के परम स्वरूप की पूजा करनी चाहिए।
 
मनुष्य को हिसा से दूर रहकर, सच बोलना चाहिए, चोरी नहीं करनी चाहिए और केवल अपने जीवन यापन के लिए जितना चाहिए उतना ही संग्रह करना चाहिए। उसे सेक्स जीवन से दूर रहना चाहिए, तपस्या करनी चाहिए, स्वच्छ रहना चाहिए, वेदों का अध्ययन करना चाहिए और भगवान् के परम स्वरूप की पूजा करनी चाहिए।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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