श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  3.28.38 
देहोऽपि दैववशग: खलु कर्म यावत्
स्वारम्भकं प्रतिसमीक्षत एव सासु: ।
तं सप्रपञ्चमधिरूढसमाधियोग:
स्वाप्नं पुनर्न भजते प्रतिबुद्धवस्तु: ॥ ३८ ॥
 
 
अनुवाद
ऐसे मुक्त योगी के इन्द्रियों सहित शरीर की ज़िम्मेदारी स्वयं भगवान उठा लेते हैं, और वो शरीर तब तक कार्य करता रहता है जब तक उसके तय किये गये कार्य पूरे नहीं हो जाते। अपनी स्वाभाविक स्थिति के प्रति जागरूक होने के कारण और योग की सर्वोच्च परमावस्था, समाधि में स्थित होने के कारण मुक्त भक्त, शरीर से जुडी चीज़ों को अपना नहीं मानता है। इसलिए वो अपने शारीरिक कार्यों को सपने में किये गये कार्यों की तरह मानता है।
 
ऐसे मुक्त योगी के इन्द्रियों सहित शरीर की ज़िम्मेदारी स्वयं भगवान उठा लेते हैं, और वो शरीर तब तक कार्य करता रहता है जब तक उसके तय किये गये कार्य पूरे नहीं हो जाते। अपनी स्वाभाविक स्थिति के प्रति जागरूक होने के कारण और योग की सर्वोच्च परमावस्था, समाधि में स्थित होने के कारण मुक्त भक्त, शरीर से जुडी चीज़ों को अपना नहीं मानता है। इसलिए वो अपने शारीरिक कार्यों को सपने में किये गये कार्यों की तरह मानता है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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