श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  3.28.35 
मुक्ताश्रयं यर्हि निर्विषयं विरक्तं
निर्वाणमृच्छति मन: सहसा यथार्चि: ।
आत्मानमत्र पुरुषोऽव्यवधानमेकम्
अन्वीक्षते प्रतिनिवृत्तगुणप्रवाह: ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
जब मन इस प्रकार भौतिक कलुषों से पूर्णतः मुक्त हो जाता है और ऐहिक लक्ष्यों से अलग हो जाता है तो दीपक की ज्योति के समान हो जाता है। उस समय मन वास्तव में परमेश्वर के समान हो जाता है और उसके साथ जुड़ा हुआ महसूस किया जाता है क्योंकि यह भौतिक गुणों के पारस्परिक संपर्क से मुक्त हो जाता है।
 
जब मन इस प्रकार भौतिक कलुषों से पूर्णतः मुक्त हो जाता है और ऐहिक लक्ष्यों से अलग हो जाता है तो दीपक की ज्योति के समान हो जाता है। उस समय मन वास्तव में परमेश्वर के समान हो जाता है और उसके साथ जुड़ा हुआ महसूस किया जाता है क्योंकि यह भौतिक गुणों के पारस्परिक संपर्क से मुक्त हो जाता है।
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