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श्लोक 3.28.34  |
एवं हरौ भगवति प्रतिलब्धभावो
भक्त्या द्रवद्धृदय उत्पुलक: प्रमोदात् ।
औत्कण्ठ्यबाष्पकलया मुहुरर्द्यमानस्
तच्चापि चित्तबडिशं शनकैर्वियुङ्क्ते ॥ ३४ ॥ |
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| अनुवाद |
| इस मार्ग का अनुसरण करते हुए योगी में भगवान् हरि के प्रति प्रेम पनपने लगता है। भक्ति करते-करते शरीर में रोमांच होने लगता है और आँखों से प्रेम के कारण आँसू निकलने लगते हैं। धीरे-धीरे मन भी भौतिक कर्मों से दूर होने लगता है, ठीक वैसे ही जैसे मछली को आकर्षित करने के लिए लगाई गई काँटों से बचने के लिए मछली दूर भाग जाती है। |
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| इस मार्ग का अनुसरण करते हुए योगी में भगवान् हरि के प्रति प्रेम पनपने लगता है। भक्ति करते-करते शरीर में रोमांच होने लगता है और आँखों से प्रेम के कारण आँसू निकलने लगते हैं। धीरे-धीरे मन भी भौतिक कर्मों से दूर होने लगता है, ठीक वैसे ही जैसे मछली को आकर्षित करने के लिए लगाई गई काँटों से बचने के लिए मछली दूर भाग जाती है। |
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