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श्लोक 3.28.32  |
हासं हरेरवनताखिललोकतीव्र-
शोकाश्रुसागरविशोषणमत्युदारम् ।
सम्मोहनाय रचितं निजमाययास्य
भ्रूमण्डलं मुनिकृते मकरध्वजस्य ॥ ३२ ॥ |
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| अनुवाद |
| इसी प्रकार योगी को भगवान् श्री हरि की उदार मुसकान का ध्यान करना चाहिए। उनकी मुसकान उन भक्तों के आँसुओं के समुद्र को सुखा देती है, जो उन्हें नमन करते हैं। उसे भगवान् की चाप जैसी भौंहों पर भी ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो कामदेव को मोहने के लिए और मुनियों के कल्याण के लिए भगवान् की आंतरिक शक्ति से प्रकट हुई हैं। |
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| इसी प्रकार योगी को भगवान् श्री हरि की उदार मुसकान का ध्यान करना चाहिए। उनकी मुसकान उन भक्तों के आँसुओं के समुद्र को सुखा देती है, जो उन्हें नमन करते हैं। उसे भगवान् की चाप जैसी भौंहों पर भी ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो कामदेव को मोहने के लिए और मुनियों के कल्याण के लिए भगवान् की आंतरिक शक्ति से प्रकट हुई हैं। |
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