श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  3.28.30 
यच्छ्रीनिकेतमलिभि: परिसेव्यमानं
भूत्या स्वया कुटिलकुन्तलवृन्दजुष्टम् ।
मीनद्वयाश्रयमधिक्षिपदब्जनेत्रं
ध्यायेन्मनोमयमतन्द्रित उल्लसद्भ्रु ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
तब योगी भगवान के सुंदर चेहरे पर ध्यान केंद्रित करता है, जिसे घुँघराले बालों से सजाया गया है और कमल जैसी आँखों और नाचती हुई भौहों से सुशोभित किया गया है। इसकी सुंदरता के आगे भौंरों से घिरा कमल और तैरती हुई मछलियों का जोड़ा भी फीका पड़ जाता है।
 
तब योगी भगवान के सुंदर चेहरे पर ध्यान केंद्रित करता है, जिसे घुँघराले बालों से सजाया गया है और कमल जैसी आँखों और नाचती हुई भौहों से सुशोभित किया गया है। इसकी सुंदरता के आगे भौंरों से घिरा कमल और तैरती हुई मछलियों का जोड़ा भी फीका पड़ जाता है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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