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श्लोक 3.28.27  |
बाहूंश्च मन्दरगिरे: परिवर्तनेन
निर्णिक्तबाहुवलयानधिलोकपालान् ।
सञ्चिन्तयेद्दशशतारमसह्यतेज:
शङ्खं च तत्करसरोरुहराजहंसम् ॥ २७ ॥ |
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| अनुवाद |
| इसके पश्चात योगी ध्यान में भगवान की चार भुजाओं का चिन्तन करे जो प्रकृति की विभिन्न क्रियाओं का नियंत्रण करने वाले देवताओं की शक्तियों के स्रोत हैं। इसके बाद योगी केन्द्रित करे अपने मन को उन चमकते आभूषणों पर जो मन्दराचल के घुमने से चमक उठे थे। साथ ही उसे ठीक प्रकार से विचार करना चाहिए भगवान के चक्र (सुदर्शन चक्र) पर जो एक हजार अरों वाला हैं और असहनीय तेज वाले हैं और शंख ध्यान में लाए, जो उनकी कमल-सदृश हथेली में हंस के समान प्रतीत होते हैं। |
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| इसके पश्चात योगी ध्यान में भगवान की चार भुजाओं का चिन्तन करे जो प्रकृति की विभिन्न क्रियाओं का नियंत्रण करने वाले देवताओं की शक्तियों के स्रोत हैं। इसके बाद योगी केन्द्रित करे अपने मन को उन चमकते आभूषणों पर जो मन्दराचल के घुमने से चमक उठे थे। साथ ही उसे ठीक प्रकार से विचार करना चाहिए भगवान के चक्र (सुदर्शन चक्र) पर जो एक हजार अरों वाला हैं और असहनीय तेज वाले हैं और शंख ध्यान में लाए, जो उनकी कमल-सदृश हथेली में हंस के समान प्रतीत होते हैं। |
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