|
| |
| |
श्लोक 3.28.26  |
वक्षोऽधिवासमृषभस्य महाविभूते:
पुंसां मनोनयननिर्वृतिमादधानम् ।
कण्ठं च कौस्तुभमणेरधिभूषणार्थं
कुर्यान्मनस्यखिललोकनमस्कृतस्य ॥ २६ ॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| फिर योगी को भगवान के वक्षस्थल का ध्यान करना चाहिए जो देवी महालक्ष्मी का आवास है। भगवान का वक्षस्थल मन के लिए समस्त दिव्य आनन्द तथा नेत्रों को पूर्ण संतोष प्रदान करने वाला है। फिर योगी को अपने मन में सम्पूर्ण विश्व द्वारा पूजित भगवान की गर्दन का ध्यान धारण करना चाहिए। भगवान की गर्दन उनके वक्षस्थल पर लटकने वाले कौस्तुभ मणि की सुंदरता को बढ़ाने वाली है। |
| |
| फिर योगी को भगवान के वक्षस्थल का ध्यान करना चाहिए जो देवी महालक्ष्मी का आवास है। भगवान का वक्षस्थल मन के लिए समस्त दिव्य आनन्द तथा नेत्रों को पूर्ण संतोष प्रदान करने वाला है। फिर योगी को अपने मन में सम्पूर्ण विश्व द्वारा पूजित भगवान की गर्दन का ध्यान धारण करना चाहिए। भगवान की गर्दन उनके वक्षस्थल पर लटकने वाले कौस्तुभ मणि की सुंदरता को बढ़ाने वाली है। |
| ✨ ai-generated |
| |
|