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श्लोक 3.28.21  |
सञ्चिन्तयेद्भगवतश्चरणारविन्दं
वज्राङ्कुशध्वजसरोरुहलाञ्छनाढ्यम् ।
उत्तुङ्गरक्तविलसन्नखचक्रवाल-
ज्योत्स्नाभिराहतमहद्धृदयान्धकारम् ॥ २१ ॥ |
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| अनुवाद |
| भक्त को चाहिए कि सर्वप्रथम अपने मन को भगवान् श्रीहरि के चरणकमलों में लीन कर ले जो वज्र, अंकुश, पताका और कमल के चिह्नों से सुशोभित हैं। उनके चरणों की शोभा चन्द्रमा से बढ़कर है। इन चरणों में सुहावने मणियों का तेज है जो भक्त के हृदय के अंधकार को मिटा देता है। |
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| भक्त को चाहिए कि सर्वप्रथम अपने मन को भगवान् श्रीहरि के चरणकमलों में लीन कर ले जो वज्र, अंकुश, पताका और कमल के चिह्नों से सुशोभित हैं। उनके चरणों की शोभा चन्द्रमा से बढ़कर है। इन चरणों में सुहावने मणियों का तेज है जो भक्त के हृदय के अंधकार को मिटा देता है। |
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