श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.28.20 
तस्मिँल्ल‍ब्धपदं चित्तं सर्वावयवसंस्थितम् ।
विलक्ष्यैकत्र संयुज्यादङ्गे भगवतो मुनि: ॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
भगवान के नित्य स्वरूप में मन को स्थिर करते समय योगी को चाहिए कि वह भगवान के समस्त अंगों पर एक साथ विचार न करे अपितु भगवान के एक-एक अंग पर ध्यान केन्द्रित करे।
 
भगवान के नित्य स्वरूप में मन को स्थिर करते समय योगी को चाहिए कि वह भगवान के समस्त अंगों पर एक साथ विचार न करे अपितु भगवान के एक-एक अंग पर ध्यान केन्द्रित करे।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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