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श्लोक 3.28.20  |
तस्मिँल्लब्धपदं चित्तं सर्वावयवसंस्थितम् ।
विलक्ष्यैकत्र संयुज्यादङ्गे भगवतो मुनि: ॥ २० ॥ |
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| अनुवाद |
| भगवान के नित्य स्वरूप में मन को स्थिर करते समय योगी को चाहिए कि वह भगवान के समस्त अंगों पर एक साथ विचार न करे अपितु भगवान के एक-एक अंग पर ध्यान केन्द्रित करे। |
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| भगवान के नित्य स्वरूप में मन को स्थिर करते समय योगी को चाहिए कि वह भगवान के समस्त अंगों पर एक साथ विचार न करे अपितु भगवान के एक-एक अंग पर ध्यान केन्द्रित करे। |
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