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श्लोक 3.28.2  |
स्वधर्माचरणं शक्त्या विधर्माच्च निवर्तनम् ।
दैवाल्लब्धेन सन्तोष आत्मविच्चरणार्चनम् ॥ २ ॥ |
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| अनुवाद |
| व्यक्ति को चाहिए कि वो अपने कर्तव्यों को यथाशक्ति अच्छे से निभाए और उन कामों को करने से बचे जो उसे नहीं करने हैं। उसे ईश्वर की कृपा से जो भी प्राप्त हो उसी से संतुष्ट रहना चाहिए और गुरु के चरणकमलों की पूजा करनी चाहिए। |
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| व्यक्ति को चाहिए कि वो अपने कर्तव्यों को यथाशक्ति अच्छे से निभाए और उन कामों को करने से बचे जो उसे नहीं करने हैं। उसे ईश्वर की कृपा से जो भी प्राप्त हो उसी से संतुष्ट रहना चाहिए और गुरु के चरणकमलों की पूजा करनी चाहिए। |
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