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श्लोक 3.28.12  |
यदा मन: स्वं विरजं योगेन सुसमाहितम् ।
काष्ठां भगवतो ध्यायेत्स्वनासाग्रावलोकन: ॥ १२ ॥ |
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| अनुवाद |
| जब इस योगाभ्यास से चित्त पूरी तरह से निर्मल व पवित्र हो जाए तब व्यक्ति को चाहिए कि वह अपनी आधी बंद आँखों से नाक के अग्रभाग पर ध्यान केन्द्रित करे और भगवान के स्वरूप का साक्षात्कार करे। |
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| जब इस योगाभ्यास से चित्त पूरी तरह से निर्मल व पवित्र हो जाए तब व्यक्ति को चाहिए कि वह अपनी आधी बंद आँखों से नाक के अग्रभाग पर ध्यान केन्द्रित करे और भगवान के स्वरूप का साक्षात्कार करे। |
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