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श्लोक 3.28.10  |
मनोऽचिरात्स्याद्विरजं जितश्वासस्य योगिन: ।
वाय्वग्निभ्यां यथा लोहं ध्मातं त्यजति वै मलम् ॥ १० ॥ |
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| अनुवाद |
| प्राणायाम का अभ्यास करने वाले योगी तुरन्त सभी मानसिक अशांति से मुक्त हो जाते हैं, उसी तरह जैसे आग में रखा सोना और उसपर हवा की फुहार चलने से सारी अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं। |
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| प्राणायाम का अभ्यास करने वाले योगी तुरन्त सभी मानसिक अशांति से मुक्त हो जाते हैं, उसी तरह जैसे आग में रखा सोना और उसपर हवा की फुहार चलने से सारी अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं। |
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