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श्लोक 3.24.42  |
व्रतं स आस्थितो मौनमात्मैकशरणो मुनि: ।
नि:सङ्गो व्यचरत्क्षोणीमनग्निरनिकेतन: ॥ ४२ ॥ |
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| अनुवाद |
| ऋषि कर्दम ने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के बारे में सोचने और केवल उनकी शरण लेने के उद्देश्य से मौन व्रत को अपनाया। बिना किसी संगी के वे एक संन्यासी की तरह पृथ्वी भर में घूमते रहे, उनका अग्नि या आश्रय से कोई संबंध नहीं था। |
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| ऋषि कर्दम ने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के बारे में सोचने और केवल उनकी शरण लेने के उद्देश्य से मौन व्रत को अपनाया। बिना किसी संगी के वे एक संन्यासी की तरह पृथ्वी भर में घूमते रहे, उनका अग्नि या आश्रय से कोई संबंध नहीं था। |
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