श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 24: कर्दम मुनि का वैराग्य  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  3.24.37 
एष आत्मपथोऽव्यक्तो नष्ट: कालेन भूयसा ।
तं प्रवर्तयितुं देहमिमं विद्धि मया भृतम् ॥ ३७ ॥
 
 
अनुवाद
यह आत्म-साक्षात्कार का मार्ग, जिसे समझना कठिन है, समय के साथ अब लुप्त हो गया है। इस दर्शन को फिर से मानव समाज में प्रस्तुत करने और समझाने के लिए ही मैंने कपिल का यह शरीर धारण किया है—ऐसा जान लो।
 
यह आत्म-साक्षात्कार का मार्ग, जिसे समझना कठिन है, समय के साथ अब लुप्त हो गया है। इस दर्शन को फिर से मानव समाज में प्रस्तुत करने और समझाने के लिए ही मैंने कपिल का यह शरीर धारण किया है—ऐसा जान लो।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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