श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 24: कर्दम मुनि का वैराग्य  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  3.24.34 
आ स्माभिपृच्छेऽद्य पतिं प्रजानां
त्वयावतीर्णर्ण उताप्तकाम: ।
परिव्रजत्पदवीमास्थितोऽहं
चरिष्ये त्वां हृदि युञ्जन् विशोक: ॥ ३४ ॥
 
 
अनुवाद
हे समस्त जीवात्माओं के स्वामी! आज मैं आपसे कुछ निवेदन करना चाहता हूँ। चूँकि आपने मेरे पितृ ऋण से मुक्त कर दिया है और मेरी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण हो चुकी हैं, इसलिए अब मैं संन्यास लेना चाहता हूँ। इस गृहस्थ जीवन को त्यागकर शोकरहित होकर सदैव अपने हृदय में आपको धारण करते हुए सर्वत्र घूमना चाहता हूँ।
 
हे समस्त जीवात्माओं के स्वामी! आज मैं आपसे कुछ निवेदन करना चाहता हूँ। चूँकि आपने मेरे पितृ ऋण से मुक्त कर दिया है और मेरी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण हो चुकी हैं, इसलिए अब मैं संन्यास लेना चाहता हूँ। इस गृहस्थ जीवन को त्यागकर शोकरहित होकर सदैव अपने हृदय में आपको धारण करते हुए सर्वत्र घूमना चाहता हूँ।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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