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श्लोक 3.24.13  |
एतावत्येव शुश्रूषा कार्या पितरि पुत्रकै: ।
बाढमित्यनुमन्येत गौरवेण गुरोर्वच: ॥ १३ ॥ |
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| अनुवाद |
| पुत्रों को अपने पिता की इसी प्रकार सेवा करनी चाहिए। पुत्र को चाहिए कि वह अपने पिता अथवा गुरु के आदेश का पालन सम्मानपूर्वक "हाँ जी" कहकर करे। |
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| पुत्रों को अपने पिता की इसी प्रकार सेवा करनी चाहिए। पुत्र को चाहिए कि वह अपने पिता अथवा गुरु के आदेश का पालन सम्मानपूर्वक "हाँ जी" कहकर करे। |
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