भगवान की कृपाएं क्या हैं? यहां यह कहा गया है कि भगवान की कृपाएं अ-भय होती हैं, भय से मुक्त होती हैं। भौतिक जगत में, यदि कोई एक मिलियन डॉलर जमा करता है, तो वह हमेशा भय से भरा रहता है क्योंकि वह हमेशा सोचता रहता है, "क्या होगा अगर पैसा खो गया?" लेकिन भगवान का आशीर्वाद, भगवत-प्रसाद, कभी नहीं खोया जा सकता। इसका केवल आनंद लिया जाना है। नुकसान का कोई सवाल ही नहीं है। व्यक्ति केवल लाभ प्राप्त करता है और लाभ उठाने का आनंद लेता है। भगवद-गीता भी इस बात की पुष्टि करती है: जब कोई भगवान की कृपा प्राप्त करता है, तो परिणाम यह होता है कि सर्व-दुःखानि, सभी संकट नष्ट हो जाते हैं। जब कोई दिव्य स्थिति में स्थित होता है, तो वह दो प्रकार के भौतिक रोगों से मुक्त हो जाता है - तृष्णा और विलाप। यह भी भगवद-गीता में कहा गया है। भक्ति जीवन शुरू होने के बाद, हम ईश्वर के प्रेम का पूरा फल प्राप्त कर सकते हैं। कृष्ण प्रेम भगवत्-प्रसाद, या दिव्य दया की सर्वोच्च सिद्धि है। यह दिव्य उपलब्धि इतनी महान मूल्यवान है कि कोई भी भौतिक सुख इसकी तुलना नहीं कर सकता। प्रबोधानंद सरस्वती ने कहा कि यदि कोई भगवान चैतन्य की कृपा प्राप्त कर लेता है, तो वह इतना महान हो जाता है कि वह देवताओं की भी परवाह नहीं करता, वह एकेश्वरवाद को नारकीय मानता है, और उसके लिए इंद्रियों को नियंत्रित करने की सिद्धि किसी भी चीज़ की तरह आसान है। स्वर्गीय सुख उसके लिए कहानियों से ज्यादा कुछ नहीं बन जाते। वास्तव में, भौतिक सुख और दिव्य सुख में कोई तुलना नहीं है।
कर्दम मुनि की कृपा से, देवहूति को केवल सेवा करने से ही वास्तविक अनुभूति हुई। हमें नारद मुनि के जीवन में एक समान उदाहरण मिलता है। अपने पिछले जीवन में, नारद एक दासी का पुत्र था, लेकिन उसकी माँ महान भक्तों की सेवा में लगी हुई थी। उन्हें भक्तों की सेवा करने का अवसर मिला, और केवल उनके भोजन के अवशेषों को खाकर और उनके आदेशों को पूरा करके वह इतने ऊँचे हो गए कि अपने अगले जीवन में वे महान व्यक्तित्व नारद बन गए। आध्यात्मिक उपलब्धि के लिए सबसे आसान रास्ता एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु की शरण लेना और पूरे दिल और आत्मा से उनकी सेवा करना है। यही सफलता का रहस्य है। जैसा कि विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने आध्यात्मिक गुरु से प्रार्थना के अपने आठ छंदों में कहा है: यस्या प्रसादाद भगवत्-प्रसादः: आध्यात्मिक गुरु की सेवा करने या उनकी कृपा प्राप्त करने से, व्यक्ति को सर्वोच्च भगवान की कृपा प्राप्त होती है। अपने भक्त पति, कर्दम मुनि की सेवा करके, देवहूति ने उनकी उपलब्धियों में हिस्सा लिया। इसी तरह, एक ईमानदार शिष्य, केवल एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु की सेवा करके, भगवान और आध्यात्मिक गुरु की सभी दया को एक साथ प्राप्त कर सकता है।
