प्रिय ब्राह्मण, जहाँ तक तुम्हारी पुत्रियों का संबंध है, वे स्वयं अपने योग्य पति ढूँढ़ लेंगी और अपने-अपने घर चली जाएँगी। किन्तु मेरे लिए, तुम्हारे संन्यासी होने के पश्चात कौन सान्त्वना देगा?
O Brahmin, as far as your daughters are concerned, they will themselves find suitable husbands and go back to their homes. But who will console me when you leave after becoming a Sanyasi?
तात्पर्य
यह कहा जाता है कि पिता ही दूसरे रूप में पुत्र बन जाता है। इसलिए पिता और पुत्र को एक ही माना जाता है। जिस विधवा का पुत्र है, वह वास्तव में विधवा नहीं है, क्योंकि उसमें अपने पति का प्रतिनिधि है। इसी प्रकार, देवहूति कार्दम मुनि से अप्रत्यक्ष रूप से एक प्रतिनिधि छोड़ने के लिए कह रही हैं ताकि उनकी अनुपस्थिति में उन्हें एक योग्य पुत्र द्वारा उनकी चिंताओं से मुक्ति मिल सके। एक गृहस्थ से यह अपेक्षा नहीं की जाती है कि वे अपने सारे दिनों घर पर ही रहें। अपने पुत्रों और पुत्रियों का विवाह करने के बाद, एक गृहस्थ गृहस्थ जीवन से निवृत्त हो सकते हैं, अपनी पत्नी को अपने बड़े हुए पुत्रों के संरक्षण में छोड़कर। वैदिक प्रणाली का यह सामाजिक रिवाज है। देवहूति परोक्ष रूप से पूछ रही हैं कि उनके घर से अनुपस्थिति में वहाँ कम-से-कम एक पुरुष बच्चा उनकी चिंताओं से उन्हें मुक्ति दिलाने के लिए हो। इस मुक्ति का अर्थ आध्यात्मिक निर्देश है। मुक्ति का मतलब भौतिक सुख नहीं है। भौतिक सुख शरीर के खतम होते ही खत्म हो जाएंगे, लेकिन आध्यात्मिक निर्देश खत्म नहीं होंगे; यह आध्यात्मिक आत्मा के साथ आगे बढ़ेगा। आध्यात्मिक उन्नति में निर्देश आवश्यक है, लेकिन एक योग्य पुत्र के बिना, देवहूति आध्यात्मिक ज्ञान में कैसे उन्नति कर सकती थीं? पति का कर्तव्य अपनी पत्नी के प्रति अपने ऋण को चुकाना है। पत्नी पति को अपनी निष्ठापूर्वक सेवा प्रदान करती है, और वह उसका ऋणी हो जाता है क्योंकि कोई भी अपने अधीनस्थ से सेवा स्वीकार नहीं कर सकता है बिना बदले में उसे कुछ दिए। आध्यात्मिक गुरु शिष्य को आध्यात्मिक निर्देश दिए बिना उसकी सेवा स्वीकार नहीं कर सकता। यह प्रेम और कर्तव्य का प्रतिदान है। इस प्रकार देवहूति अपने पति, कार्दम मुनि को याद दिलाती हैं कि उन्होंने उन्हें निष्ठापूर्वक सेवा प्रदान की है। अपनी पत्नी के प्रति अपने ऋण को चुकाने के आधार पर भी विचार करें, तो उन्हें जाने से पहले एक पुरुष बच्चा देना चाहिए। अप्रत्यक्ष रूप से, देवहूति अपने पति से अनुरोध करती हैं कि वे कुछ दिनों और घर पर रहें, या कम-से-कम तब तक जब तक एक पुरुष बच्चा पैदा न हो जाए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥