"यस्यैक-निश्वसित-कालमथवलम्ब्य
जीवंति लोम-विलज जगदंड-नाथा:
विष्णुर्महान स इह यस्य कला-विशेषो
गोविंदम आदि पुरुषम तमहम भजामि"
"मैं सर्व कारणों के कारण, परम व्यक्तित्व भगवान, गोविंद की आराधना करता हूँ, जिनके पूर्ण अंश महा विष्णु हैं। असंख्य ब्रह्मांडों (ब्रह्मा) के सभी प्रमुख उनकी एक साँस के समय में ही आश्रय लेकर जीवित रहते हैं।" अवैयक्तिक लोग भगवान के रूप में विश्वाश नहीं करते और इस तरह से वे शायद ही कभी भगवान की नींद पर विश्वाश करेंगे। उनका विचार ज्ञान के एक गरीब कोष से प्राप्त होता है; वे मानव क्षमता के संदर्भ में हर चीज की गणना करते हैं। उन्हें लगता है कि सर्वोच्च का अस्तित्व मानव के सक्रिय अस्तित्व के बिल्कुल विपरीत है: क्योंकि मनुष्य के पास इंद्रियाँ हैं, तो सर्वोच्च को इंद्रिय अनुभूति से रहित होना चाहिए; क्योंकि मानव के पास एक रूप है, इसलिए सर्वोच्च को निराकार होना चाहिए; और क्योंकि मनुष्य सोता है, इसलिए सर्वोच्च को नहीं सोना चाहिए। हालाँकि, श्रीमद्-भागवतम् ऐसे अवैयक्तिक लोगों से सहमत नहीं है। यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि परम भगवान योग-निद्रा में विश्राम करते हैं, जैसा कि पहले भी चर्चा की जा चुकी है। और चूँकि वो सोते हैं, इसलिए स्वाभाविक रूप से उन्हें सांस लेनी चाहिए और ब्रह्म-संहिता पुष्टि करती है कि उनकी श्वास अवधि के भीतर असंख्य ब्रह्मा जन्म लेते हैं और मरते हैं।
श्रीमद्-भागवतम और ब्रह्म-संहिता के बीच पूर्ण सहमति है। अनादि काल ब्रह्मा के जीवन के साथ कभी नष्ट नहीं होता है। यह जारी रहता है, लेकिन सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान को नियंत्रित करने की इसकी कोई क्षमता नहीं है क्योंकि भगवान काल के नियंत्रक हैं। आध्यात्मिक दुनिया में निःसंदेह समय है, लेकिन इसका गतिविधियों पर कोई नियंत्रण नहीं है। समय असीमित है और आध्यात्मिक दुनिया भी असीमित है, क्योंकि वहाँ सब कुछ पूर्ण तल पर मौजूद है।
