| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति » अध्याय 8: राजा परीक्षित द्वारा पूछे गये प्रश्न » श्लोक 6 |
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| | | | श्लोक 2.8.6  | धौतात्मा पुरुष: कृष्णपादमूलं न मुञ्चति ।
मुक्त सर्वपरिक्लेश: पान्थ: स्वशरणं यथा ॥ ६ ॥ | | | | | | अनुवाद | | एक बार भक्ति के द्वारा जिसका हृदय स्वच्छ हो जाता है, ऐसा भक्त श्रीकृष्ण के चरणकमलों का कभी त्याग नहीं करता, क्योंकि जैसे एक यात्री कष्टकारी यात्रा के बाद अपने घर पर संतुष्ट होता है, उसी प्रकार भगवान कृष्ण उसकी परम तुष्टि पूरी करते हैं। | | | | एक बार भक्ति के द्वारा जिसका हृदय स्वच्छ हो जाता है, ऐसा भक्त श्रीकृष्ण के चरणकमलों का कभी त्याग नहीं करता, क्योंकि जैसे एक यात्री कष्टकारी यात्रा के बाद अपने घर पर संतुष्ट होता है, उसी प्रकार भगवान कृष्ण उसकी परम तुष्टि पूरी करते हैं। | | ✨ ai-generated | | |
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