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श्लोक 2.8.22  |
यो वानुशायिनां सर्ग: पाषण्डस्य च सम्भव: ।
आत्मनो बन्धमोक्षौ च व्यवस्थानं स्वरूपत: ॥ २२ ॥ |
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| अनुवाद |
| कृपया यह भी बताएँ कि भगवान् के शरीर में समाहित जीवों की उत्पत्ति कैसे होती है और पाखंडी लोग इस संसार में कैसे प्रकट होते हैं? यह भी बताएँ कि अबद्ध जीव किस प्रकार विद्यमान रहते हैं? |
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| कृपया यह भी बताएँ कि भगवान् के शरीर में समाहित जीवों की उत्पत्ति कैसे होती है और पाखंडी लोग इस संसार में कैसे प्रकट होते हैं? यह भी बताएँ कि अबद्ध जीव किस प्रकार विद्यमान रहते हैं? |
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