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श्लोक 2.8.11  |
पुरुषावयवैर्लोका: सपाला: पूर्वकल्पिता: ।
लोकैरमुष्यावयवा: सपालैरिति शुश्रुम ॥ ११ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे विद्वान ब्राह्मण, पहले तो यह समझाया गया था कि ब्रह्माण्ड के सभी लोक अपने-अपने लोकपालों के साथ विराट पुरुष के विशाल शरीर के विभिन्न अंगों में ही स्थित हैं। मैंने यह भी सुना है कि विभिन्न लोकमंडल विराट पुरुष के विराट शरीर में स्थित माने जाते हैं। लेकिन उनकी वास्तविक स्थिति क्या है? कृपया मुझे समझाइये। |
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| हे विद्वान ब्राह्मण, पहले तो यह समझाया गया था कि ब्रह्माण्ड के सभी लोक अपने-अपने लोकपालों के साथ विराट पुरुष के विशाल शरीर के विभिन्न अंगों में ही स्थित हैं। मैंने यह भी सुना है कि विभिन्न लोकमंडल विराट पुरुष के विराट शरीर में स्थित माने जाते हैं। लेकिन उनकी वास्तविक स्थिति क्या है? कृपया मुझे समझाइये। |
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